Showing posts with label स्वास्थ्य. Show all posts
Showing posts with label स्वास्थ्य. Show all posts

2016-10-23

गुड़ खाने के फायदे

गुड़ खाने से फायदे
गुड़ खाने के फायदे :-


1. गुड़ शरीर को विषाक्त पदार्थों से छुटकारा पाने में मदद करता है। सर्दियों में, यह शरीर के तापमान को विनियमित करने में मदद करता है।
2.गुड़ गले और फेफड़ों के संक्रमण के इलाज में फायदेमंद होता है।
3. गुड़ खाने से याद्दाश्त कमजोर नहीं होती, इसलिए अगर आप अपनी याद्दाश्त दुरुस्त रखना चाहते हैं,तो इसका नियमित सेवन करें।
4. थकान मिटाने के लिए गुड़ का शर्बत पीएं।
5. अगर आपके कान में दर्द रहता है, तो घी में गुड़ मिलाकर खाएं।
6. जुकाम को भगाने में भी ये लाभदायक साबित होता है।
7. अगर आपको कम भूख लगती है, तो इसका सेवन करें.इसका सेवन करने से भूख ज्यादा लगती है।
8. अस्थमा से परेशान लोगों के लिए गुड़ और काले तिल से बने लड्डू खाना फायदेमंद होता हैं।
9. दिल की बीमारी से परेशान लोगों के लिए लाभदायक साबित होता है।
10. गुड़ खाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है।

2016-09-25

आयुर्वेद में वटी के उपयोग

निरोगी काया अनमोल रत्न

आयुर्वेद में वटी के उपयोग



व्योषादी वटी
यह वटी गले और कंठ की बीमारियों में जैसे गले की खराश, गले में हो रही खुजली, टॉन्सिल और अन्य गले की समस्याओं में लाभदायक है। इस वटी को दिन में कही बार चूस सकते है जिससे गले की समस्या में तुरंत राहत मिलेगी। 

विषमुष्टियादि वटी
इस वटी का उपयोग अग्नि बढ़ाने वाली, पाचन में उपयोगी है साथ ही साथ वात लक्षण से बुखार आया हो जिससे पेट में कब्ज है या पेट साफ ना होता हो तो यह वटी गुणकारी है। यह वटी  उदर शूल, स्नायु की दुर्बलता, गठिया, जोड़ो का दर्द, वात रोग में लाभदायक है। इस वटी को आवष्यकता नुसार १-1 या फिर २-२ सुबह शाम गुनगुने पानी के साथ भोजन के १० मिनट बाद दे सकते है। 

2016-08-12

पेट और वजन कम करने के सर्वोत्तम उपाय

पेट और वजन कम करने के सबसे सर्वोत्तम  उपाय

पेट और वजन या यूँ कहे के मोटापा घटाने के लिए खान-पान में सुधार जरूरी है। कुछ प्राकृतिक चीजें ऐसी हैं, जिनके सेवन से वजन नियंत्रित रहता है। इसलिए यदि आप वजन कम करने के लिए बहुत मेहनत नहीं कर पाते हैं तो अपनाएं यहां बताए गए छोटे-छोटे उपाय। ये आपके बढ़ते वजन को कम कर देंगे।

1) सब्जियों और फलों में कैलोरी कम होती है, इसलिए इनका सेवन अधिक मात्रा में करें। केला और चीकू न खाएं। इनसे मोटापा बढ़ता है। पुदीने की चाय बनाकर पीने से मोटापा कम होता है।


2016-08-01

साँप के काटने का इलाज

साँप के काटने का इलाज जरूर पढ़ें, पता नहीं कब यह आपके या किसी के काम आ सकता है ।

दोस्तो सबसे पहले साँपो के बारे मे एक महत्वपूर्ण बात आप ये जान लीजिये ! कि अपने देश भारत मे 550 किस्म के साँप है ! जैसे एक cobra है ,viper है ,Krait है ! ऐसी 550 किस्म की साँपो की जातियाँ हैं ! इनमे से मुश्किल से 10 साँप है जो जहरीले है सिर्फ 10 ! बाकी सब non poisonous है! इसका मतलब ये हुआ 540 साँप ऐसे है जिनके काटने से आपको कुछ नहीं होगा !! बिलकुल चिंता मत करिए !

Russell Viper
लेकिन साँप के काटने का डर इतना है (हाय साँप ने काट लिया ) और कि कई बार आदमी heart attack से मर जाता है ! जहर से नहीं मरता cardiac arrest से मर जाता है ! तो डर इतना है मन मे ! तो ये डर निकलना चाहिए !

2016-07-21

आंखें बहुत अनमोल हैं इनकी करें खास केयर

आंखें बहुत अनमोल होती है। आंखों से हम प्राकृतिक नजारों का मज़ा लेते हैं। इसलिए इनकी देखभाल करना भी बहुत जरूरी है। अगर हम इनकी अच्छे से केयर करें तो काफी हद तक आंखों की परेशानियों से निजात पाई जा सकती है। अच्छा खान-पान,विटामिन-ए युक्त आहार और कुछ  अन्य बातों का ध्यान रखकर हम अपनी आंखों की सुंदरता बरकरार रख सकते हैं।

1. आंखों की सफाई
आंखों को स्वस्थ रखने के लिए इनकी सफाई रखना बहुत जरूरी है। कई बार आंखों   में जलन, खुजली, पानी आना,  आंखों का लाल होना जैसी समस्या भी आ सकती है। इसके लिए आप आंखों को दिन में 3-4 बार ठंडे पानी से अच्छीं तरह से धोएं।

2. पौष्टिक भोजन 
अपने आहार में विटामिन -ए , प्रोटीन वाले भोजन शामिल करें जैसे दूध, पनीर, मक्खन,अंंडे,फल शामिल करें।

2016-06-07

प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली

*"प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली"*



पानी में गुड डालिए,
बीत जाए जब रात!
सुबह छानकर पीजिए,
अच्छे हों हालात!!
धनिया की पत्ती मसल,
बूंद नैन में डार!
दुखती अँखियां ठीक हों,
पल लागे दो-चार!!
ऊर्जा मिलती है बहुत,
पिएं गुनगुना नीर!
कब्ज खतम हो पेट की,
मिट जाए हर पीर!!

2016-06-02

पहले शरीर को तैयार करे

योगासन नही आता हें तो केवल सुबह की सैर आपको आरोय्ग दे सकती हें | योग का पहला संबध स्वास्थ हें | शरीर स्वास्थ होगा तभी आप योग साधना के लिय अपने आप को तैयार कर सकते हें | “आप ध्यान करो” वह कैसे करे, उसका मन नही लगेगा | स्थूल शरीर में कही दर्द हें तो साधक का मन दर्द की ओर लगेगा | इसीलिए पहली नर्सरी से शुरुआत करो, तभी आगे बढ़ सकोगे |

           पहले व्यायाम (योग आसन) और प्राणायाम से शुरुआत करना चाहिये | पहले काया को साधो बाद में योग को साधो |       

2016-06-01

रोगों के हिन्दी और अंग्रेजी नाम

रोगों के हिन्दी और अंग्रेजी नाम 


  • गर्भपात की आशंका Abortion Threatened
  • फोड़ा या घाव Abscess
  • एसीडिटी (गैस बनना) Acidity
  • चेहरे पर फुंसी Acne
  • नाक और गले के बीच में तन्तुओं का बढ़ना Adenoids
  • बच्चे के जन्म देने के बाद होने वाला दर्द After-Pains
  • स्त्री के स्तनों में दूध का कम हो जाना Agalactia
  • पेशाब में ऐल्ब्यूमिन आना Albuminuria
  • शराब पीने की आदत Albuminuria
  • गंजापन (बालों का झड़ना) Alopecia (Baldness)
  • खून की कमी Anemia
  • दिल का दर्द Angina Pectoris
  • भूख न लगना Anorexia
  • पेशाब का रुक जाना Anuria

2016-05-19

उष्माघात ... लू लगना

उष्माघात ... लू लगना
लू लगने से मृत्यु क्यों होती है? 


हम सभी धूप में घूमते हैं फिर कुछ लोगो की ही धूप में जाने के कारण अचानक मृत्यु क्यों हो जाती है?

 हमारे शरीर का तापमान हमेशा 37° डिग्री सेल्सियस होता है, इस तापमान पर ही हमारे शरीर के सभी अंग सही तरीके से काम कर पाते है।

 पसीने के रूप में पानी बाहर निकालकर शरीर 37° सेल्सियस टेम्प्रेचर मेंटेन रखता है, लगातार पसीना निकलते वक्त भी पानी पीते रहना अत्यंत जरुरी और आवश्यक है।

2016-04-04

बालों को काला करने के आयुर्वेदिक टिप्स

बालों को काला करने के आयुर्वेदिक टिप्स

बालों को प्राकृतिक रूप से काला करने के लिये आयुर्वेद में उपायों का खजाना है. काले-घने और लंबे बालों का राज है बालों की जड़ों को मिलने वाला पोषण। बालों को पोषण कलर, डाई या शैंपू से नहीं बल्कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों (Ayurvedic Herbs) वाले से धोने या आयुर्वेदिक तेल (Ayurvedic Oils) लगाने से मिलता है।


आइए जानते हैं, कुछ ऐसे आयुर्वेदिक उपायों (Ayurveidc Tips or Home Remedies) के बारे में जिसे इस्तेमाल करने से बाल न सिर्फ काला होता है बल्कि उनमें कुदरती चमक भी आती है। साथ ही, बालों का झड़ना-गिरना (Hair Fall) भी बंद हो जाता है।

1. आंवला पाउडर (Aanvala Powder)
आंवले के पाउडर को लोहे के काले रंग के बर्तन में एक दिन तक रखिए और दूसरे दिन सुबह इसमें थोड़ा पानी मिलाकर पेस्ट बना लीजिए। इस पेस्ट को पूरे एक हफ्ते तक पानी मिला कर लोहे बर्तन में रखना है। हफ्ते भर में यह पेस्ट बिल्कुल काला हो जाएगा। जब यह पेस्ट पूरी तरह काला हो जाए तो इसे डाई की तरह बालों में लगाएं। इस विधि को दो-तीन बार अलग-अलग दिन पर आजमाए। बालों में कुदरती काला रंग आने लगेगा।


2. शिकाकाई (Shikakai)
शिकाकाई और सूखे आंवले लेकर को अच्छी तरह से कूट ले। दोनों के टुकड़ों को रात भर पानी में भिगों कर रखें। सुबह इस पानी को कपड़े के साथ मसलकर छान लें और इससे बालों की मालिश करें। मालिश करने के आधा घंटा बाद बाद नहा लें। बालों के सूखने पर नारियल का तेल लगायें। ऐसा करने से बाल काले, लंबे, मुलायम और चमकदार होते हैं। खास बात यह है कि शिकाकाई और आंवले से बाल कभी सफेद नहीं होते व जिनके बाल सफेद हों तो वे भी काले हो जाते हैं।

2016-03-21

थायराइड की वजह क्या है ।

क्या है थायराइड की वजह ....?


थायराइड मानव शरीर मे पाए जाने वाले एंडोक्राइन ग्लैंड में से एक है। थायरायड ग्रंथि गर्दन में श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यन्त्र के दोनों ओर दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली जैसा होता है। यह थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है जिससे शरीर के ऊर्जा क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता नियंत्रित होती है।

यह ग्रंथि शरीर के मेटाबॉल्जिम को नियंत्रण करती है यानि जो भोजन हम खाते हैं यह उसे उर्जा में बदलने का काम करती है।

2016-03-17

औषधीय वनस्पति की प्रार्थना

औषधीय वनस्पति



यजुर्वेद में औषधीय वनस्पति की प्रार्थना – ‘दीर्घायुस्ते औषधे खनिता …’

प्राचीन वैदिक ग्रंथ यजुर्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना संबंधी मंत्र दिये गये हैं । इनमें से दो, मंत्र संख्या 100 एवं 101, इस प्रकार हैं:


दीर्घायुस्त औषधे खनिता यस्मै च त्वा खनाम्यहम् । अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात् ।।
(शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अध्याय १२, मंत्र १०० )

(दीर्घायुः त औषधे खनिता यस्मै च त्वा खनामि अहम्, अथो त्वं दीर्घायुः भूत्वा शत-वल्शा विरोहतात् । खनिता, खनन करने वाला; शत-वल्शा, सौ अंकुरों वाला; विरोहतात्, ऊपर उठो, आरोहण पाओ)

हे ओषधि, हे वनस्पति, तुम्हारा खनन (खोदने का कार्य) करने वाला मैं दीर्घायु रहूं; जिस आतुर रोगी के लिए मैं खनन कर रहा हूं वह भी दीर्घायु होवे । तुम स्वयं दीर्घायु एवं सौ अंकुरों वाला होते हुए ऊपर उठो, वृद्धि प्राप्त करो ।
त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा उपस्तयः । उपस्तिरस्तु सोऽस्माकं यो अस्मॉं२ऽभिदासति ।।
(शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अध्याय १२, मंत्र १०१)

(त्वम् उत्तम असि ओषधे, तव वृक्षा उपस्तयः, उपस्तिः अस्तु साः अस्माकं यो अस्मान् अभिदासति । उपस्तयः, उपकार हेतु स्थित (बहुवचन); उपस्तिः उपकार हेतु स्थित (एकवचन); अभिदासति, हानि पहुंचाता है)

हे औषधि, तुम उत्तम हो, उपकारी हो; तुम्हारे सन्निकट लता, गुल्म, झाड़ी, वृक्ष आदि (अन्य वनस्पतियां) तुम्हारा उपकार करने वाले होवें, अर्थात् तुम्हारी वृद्धि में सहायक होवें । हमारी यह भी प्रार्थना है कि जो हमारा अपकार करने का विचार करता हो, जो हमें हानि पहुंचा रहा हो, वह भी हमारी उपकारी बने, हमारे लाभ में सहायक होवे ।

2016-03-10

जीवेम शरदः शतम्

जीवेम शरदः शतम्  


स्वस्थ रहना मनुष्य का अधिकार है, एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । इसी आधार पर हमारे ऋषिगणों ने मनुष्य के लिए जीवेम शरदः शतम् व्यक्ति सौ वर्ष तक जिए, निरोग जीवन जीकर सौ वर्षों की आयुष्य का आनन्द ले, सूत्र दिया था । सौ वर्ष से भी अधिक जीने वाले, स्वास्थ्य के मौलिक सिद्धान्तों को जीवन में उतारने वाले अनेकानेक व्यक्ति कभी वसुधा पर थे एवं इसे एक सामान्य सी बात माना जाता था । स्वस्थ वृत्त को जीवन में उतारने वाला सौ वर्ष तक जीकर ही-अपना सारा जीवन व्यापार पूरा कर ही मोक्ष को प्राप्त होगा, यह हमारी संस्कृति का कभी जीवन दर्शन था । किन्तु आज यह सब एक विलक्षणता मानी जाती है जब सुनने में आता है कि किसी ने सौ वर्ष पार कर लिए व अभी भी नीरोग है ।

रोग क्यों होते हैं, उनका कारण क्या है व कौन-कौन से घटक इसके लिए जिम्मेदार होते हैं, यहाँ से यह खण्ड आरंभ होता है । रोगों की उत्पत्ति की जड़ हमारी जीवन शैली का त्रुटिपूर्ण होना है तथा कब्ज से लेकर आहार के असंयम रहन-सहन से लेकर मानसिक तनाव तथा दैवी प्रतिकूलताओं से लेकर बैक्टीरिया-वायरस के कारण हमारी जीवनी शक्ति-प्राणशक्ति यदि अक्षुण्ण रहे व जीवन शैली सही रहे तो हमें कभी रोग-शोक सता नहीं सकते । पंचभूतों से बनी इस काया को जिसे अंत में मिट्टी में ही मिल जाना है क्या हम पंचतत्त्वों आकाश, वायु, जल, मिट्टी, अग्नि के माध्यम से स्वस्थ बना सकते हैं, इसका समग्र विवेचन इस खण्ड में विस्तार से हुआ हैं प्राकातिक चिकित्सा का यही सिद्धान्त है कि पंचतत्त्वों से ही रोगों को दूरकर अक्षुण स्वास्थ्य प्रदान किया जाय । पंचमहाभूतों को आकाश को ध्वनि से, वायु को स्पर्श से, अग्नि को रंग-रूप-ऊर्जा से, जल को रस-स्वाद से तथा पृथ्वी को गंध से जाना जाता है । यही गुण स्वास्थ्य संवर्धन में भी काम आते हैं ।


क्या कायाकल्प बिना किसी ओषधि के भी हो सकता है ? उत्तम स्वास्थ्य बिना ओषधि के बनाए रखने के लिए  चारसूत्र  हैं- 

  1. खाद्य पदार्थों का सही चुनाव, 
  2. सही खाने का तरीका, 
  3. समुचित परिश्रम, 
  4. अव्यवस्था से बचकर व्यवस्थित जीवनचर्या । 


उपवास, शरीर शुद्धि व कायाकल्प के सिद्धान्त को अपनाना होगा । यदि इन सभी बातों का ध्यान रखकर नैसर्गिक जीवनचर्या को अंगीकार कर ले, वैसा ही आहार ले व चिंतन स्वस्थ, मन प्रफुल्लित रखे तो किसी तरह की कोई व्याधि होने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता ।

चूंकि आज का मनुष्य निर्भर तो कात्रिम साधनों पर ही है । हवा, पानी भी विषाक्त हो चुके हैं । ऐसे में यदि ओषधियों की आवश्यकता भी पड़े तो इसके लिए कौन सी ली जायँ ।  जड़ी-बूटी स्वस्थ नीरोग जीवन प्रदान करती हैं । उनके कोई दुष्परिणाम नहीं होते व सही अनुपान के साथ सही वीर्य कालावधि में पकी ओषधि लेने पर लाभ ही लाभ पहुँचाती है ।

आर्युवेद का गौरव है वनौषधियाँ जिनमें समग्रता होती है । यदि यह विज्ञान घर-घर फैल सके तो हमारी ऐलोपैथी पर-तेज असर कारक औषधियों पर निर्भरता समाप्त हो जायगी ।  घर में ही पायी जाने वाली, आँगन में उगायी जा सकने वाली औषधियों से जिन्हें हम मसालों में प्रयोग करते हैं अनेकानेक रोगों का उपचार किया जा सकता है । राई, हल्दी, अदरक, सौंफ, मेथी, जीरा, मिर्च, पुदीना, गिलोय, तुलसी, अजवाइन, धनिया, टमाटर, लहसुन, ग्वारपाठा, प्याज, आँवला ऐसी औषधियाँ हैं जो घर-घर हो सकती हैं, सूखी स्थिति में कुछ रखी भी जा सकती हैं । सुहागा, हींग, काला नमक, लौंग, तेज पत्रक, दालचीनी, ऐसे हैं जिन्हें सुरक्षित अपने पास रखकर विभन्न रोगों में प्रयोग किया जा सकता है । अंत में कल्पचिकित्सा के विभन्न पक्षों पर पूज्यवर ने कलम-चलाई है । आर्युवेदोक्त पंचकर्म से लेकर कुटी प्रवेश तथा विभन्न कल्प प्रयोगों को पढ़कर हर किसी को लगेगा कि आज के युग में भी सौ वर्ष जीवित रहना कोई असंभव कार्य नहीं है॥

कैंसररोधी योहाना बुडविज आहार विहार

कैंसररोधी योहाना बुडविज आहार विहार

जानिये डॉ योहाना बुडविज के बारे में

डॉ योहाना बुडविज (जन्म 30 सितम्बर, 1908 – मृत्यु 19 मई 2003) विश्व विख्यात जर्मन जीवरसायन विशेषज्ञ व चिकित्सक थीं। उन्होंने भौतिक विज्ञान, जीवरसायन विज्ञान, भेषज विज्ञान में मास्टर की डिग्री हासिल की व प्राकृतिक विज्ञान में पी.एच.ड़ी. की। वे जर्मन व सरकार के खाद्य और भेषज विभाग में सर्वोच्च पद पर कार्यरत थी और सरकार की विशेष सलाहकार थी। वे जर्मनी व यूरोप की विख्यात वसा और तेल विशेषज्ञ थी। उन्होंने वसा, तेल तथा कैंसर के उपचार के लिए बहुत शोध की। उनका नाम नोबल पुरस्कार के लिए 7 बार चयनित हुआ। वे आजीवन शाकाहारी रहीं। जीवन के अंतिम दिनों में भी वे सुंदर, स्वस्थ व अपनी आयु से काफी युवा दिखती थी। उन्होंने पहली बार संतृप्त और असंतृप्त वसा पर बहुत शोध किया। उन्होंने पहली बार आवश्यक वसा अम्ल ओमेगा-3 व ओमेगा–6 को पहचाना और उन्हें पहचानने की पेपर क्रोमेटोग्राफी तकनीक विकसित की। इनके हमारे शरीर पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन किया। उन्होंने यह भी पता लगाया कि ओमेगा – 3 किस प्रकार हमारे शरीर को विभिन्न बीमारियों से बचाते हैं तथा स्वस्थ शरीर को ओमेगा–3 व ओमेगा–6 बराबर मात्रा में मिलना चाहिये। इसीलिये उन्हे “ओमेगा-3 लेडी” के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा मार्जरीन (वनस्पति घी), ट्रांस फैट व रिफाइण्ड तेलों के हमारे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का पता लगाया था। वे मार्जरीन, हाइड्रोजिनेटेड और रिफाइंड तेलों को प्रतिबंधित करना चाहती थी जिसके कारण खाद्य तेल और मार्जरीन बनाने वाले संस्थान परेशानी में थे।

1931 में डॉ. ओटो वारबर्ग को कैंसर पर उनकी शोध के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था। उन्होंने पता लगाया था कि कैंसर का मुख्य कारण कोशिकाओं में होने वाली श्वसन क्रिया का बाधित होना है। यदि कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे तो कैंसर का अस्तित्व ही संभव नहीं है। परन्तु तब वारबर्ग यह पता नहीं कर पाये कि कैंसर कोशिकाओं की बाधित श्वसन क्रिया को कैसे ठीक किया जाये।

2016-03-09

अलसी खाने वाले विद्यार्थी परीक्षाओं में अच्छे नंबर प्राप्त करते हैं

अलसी - एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजन 

अलसी शरीर को स्वस्थ रखती है व आयु बढ़ाती है। अलसी में 23प्रतिशत ओमेगा-3 फेटी एसिड, 20 प्रतिशत प्रोटीन, 27 प्रतिशत फाइबर, लिगनेन, विटामिन बी ग्रुप, सेलेनियम, पोटेशियम, मेगनीशियम, जिंक आदि होते हैं। सम्पूर्ण विश्व ने अलसी को सुपर स्टार फूड के रूप में स्वीकार कर लिया है और इसे आहार का अंग बना लिया है, लेकिन हमारे देश की स्थिति बिलकुल विपरीत है, पुराने लोग अलसी का नाम भूल चुके है और युवाओं ने अलसी का नाम सुना ही नहीं है। मैंने इसी चमत्कारी भोजन की पूरे भारत में जागरूकता लाने के  काम  का बीड़ा उठाया है। अलसी को अतसी, उमा, क्षुमा, पार्वती, नीलपुष्पी, तीसी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। अलसी दुर्गा का पांचवा स्वरूप है। प्राचीनकाल में नवरात्री के पांचवे दिन स्कंदमाता यानी अलसी की पूजा की जाती थी और इसे प्रसाद के रूप में खाया जाता था। जिससे वात, पित्त और कफ तीनों रोग दूर होते थे और जीते जी मोक्ष की प्राप्ति हो जाती थी। 

o   ओमेगा-थ्री हमे रोगों से करता है फ्री। शुद्ध, शाकाहारी, सात्विक, निरापद और आवश्यक ओमेगा-थ्री का खजाना है अलसी। ओमेगा-3 हमारे शरीर की सारी कोशिकाओं, उनके न्युक्लियस, माइटोकोन्ड्रिया  आदि संरचनाओं के बाहरी खोल या झिल्लियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यही इन झिल्लियों को वांछित तरलता, कोमलता और पारगम्यता प्रदान करता है। ओमेगा-3 का अभाव होने पर शरीर में जब हमारे शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाती है तो ये भित्तियां मुलायम व लचीले ओमेगा-3 के स्थान पर कठोर व कुरुप ओमेगा-6 फैट या ट्रांस फैट से बनती है, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 का संतुलन बिगड़ जाता है, प्रदाहकारी प्रोस्टाग्लेंडिन्स बनने लगते हैं, हमारी कोशिकाएं इन्फ्लेम हो जाती हैं, सुलगने लगती हैं और यहीं से ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, डिप्रेशन, आर्थ्राइटिस और कैंसर आदि रोगों की शुरूवात हो जाती है।

o   कब्जासुर का वध करती है अलसी। आयुर्वेद के अनुसार हर रोग की जड़ पेट है और पेट साफ रखने में यह इसबगोल से भी ज्यादा प्रभावशाली है। आई.बी.एस., अल्सरेटिव कोलाइटिस, अपच, बवासीर, मस्से आदि का भी उपचार करती है अलसी।

2016-03-08

Regular sex is good for the prostate

FULL TEXT OF PROSTATE HEALTH AWARENESS LECTURE PRESENTED AT MEETING OF FGBMFI (NORTH-GATE CHAPTER) ON SATURDAY 19th SEPTEMBER 2015

MEN - MY CHILDHOOD; MY MANHOOD; MY PROSTATE.. MUST READ!!


Ladies and Gentlemen
I am here to speak with you on Prostate. The topic is misleading. Is prostate strictly for men? Yes, ONLY men have prostate and ONLY men over 40 years but the healthcare enlightenment is for everyone. There is no woman who does not know a man 40 years and above – father, uncle, brother, son, friend, neighbor, colleague …

Essentially what I will be doing today is health promotion. Responsible health promotion must provide three things:

1. Information
2. Reassurance
3. A plan of action.

Let me start with a background on prostate health.

2016-02-25

एलोवेरा जूस बनाने की विधि

एलोवेरा एक अत्यंत उपयोगी पौधा है, जिसे ग्वारपाठा, क्वारगंदल, घृतकुमारी, कुमारी, घी-ग्वारएलोवेरा के नामों से भी जाना जाता है। इसका रस शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, कोलेस्ट्राल कम करता है तथा रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है। 

बाजार में एलोवेरा जूस बहुत अधिक दामों पर मिलता है, जबकि आप घर पर इसका जूस आसानी से निकाल सकते हैं।

एलोवेरा जूस बनाने की विधि:

2016-02-19

एसिडिटी का घरेलू उपचार

एसिडिटी का घरेलू उपचार Home remedy for acidity


1. एसिडिटी होने पर चाय काफी का सेवन कम कर देना चाहिए। ग्रीन टी का सेवन लाभप्रद होता है।
2. अधिक से अधिक हरी सब्जियों का खासकर जिन सब्जियों में विटामिन बी और ई हो, सेवन करना चाहिए। जैसे की सहजन, बीन्स, कद्दू, पत्ता गोभी, प्याज और गाजर।
3. खाना खाने के बाद तरल पेय का सेवन न करें। आधे घंटे के बाद ही गुनगुना नीबू पानी पियें।
4. खाने में केला,खीरा,,ककड़ी, तरबूज, नारियल पानी धनिये पुदीने की चटनी और बादाम की शिकंजी का सेवन करना चाहिए।

2016-02-02

बरगद यानी वट बृक्ष का औषधीय उपयोग

The medicinal use of Banyan tree

Banyan treeक्या आप जानते हैं कि बरगद यानी वट बृक्ष का पेड सैकडों रोगों की अचूक दवा भी है ....

बरगद का पेड़- हिंदू संस्कृति में वट वृक्ष यानी बरगद का पेड़ बहुत महत्त्व रखता है। इस पेड़ को त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में वटवृक्ष के बारे में विस्तार से बताया गया है। वट वृक्ष मोक्षप्रद है और इसे जीवन और मृत्यु का प्रतीक माना जाता है। जो व्यक्ति दो वटवृक्षों का विधिवत रोपण करता है वह मृत्यु के बाद शिवलोक को प्राप्त होता है। इस पेड़ को कभी नहीं काटना चाहिए। मान्यता है कि निःसंतान दंपति बरगद के पेड़ की पूजा करें तो उन्हें संतान प्राप्ति हो सकती है।

1-आग से जल जाना - दही के साथ बड़ को पीसकर बने लेप को जले हुए अंग पर लगाने से जलन दूर होती है। जले हुए स्थान पर बरगद की कोपल या कोमल पत्तों को गाय के दही में पीसकर लगाने से जलन कम हो जाती है।

2 - बालों के रोग - बरगद के पत्तों की 20 ग्राम राख को 100 मिलीलीटर अलसी के तेल में मिलाकर मालिश करते रहने से सिर के बाल उग आते हैं। बरगद के साफ कोमल पत्तों के रस में, बराबर मात्रा में सरसों के तेल को मिलाकर आग पर पकाकर गर्म कर लें, इस तेल को बालों में लगाने से बालों के सभी रोग दूर हो जाते हैं।
25-25 ग्राम बरगद की जड़ और जटामांसी का चूर्ण, 400 मिलीलीटर तिल का तेल तथा 2 लीटर गिलोय का रस को एकसाथ मिलाकर धूप में रख दें, इसमें से पानी सूख जाने पर तेल को छान लें। इस तेल की मालिश से गंजापन दूर होकर बाल आ जाते हैं और बाल झड़ना बंद हो जाते हैं।

बरगद की जटा और काले तिल को बराबर मात्रा में लेकर खूब बारीक पीसकर सिर पर लगायें। इसके आधा घंटे बाद कंघी से बालों को साफ कर ऊपर से भांगरा और नारियल की गिरी दोनों को पीसकर लगाते रहने से बाल कुछ दिन में ही घने और लंबे हो जाते हैं।

3 - नाक से खून बहना - 3 ग्राम बरगद की जटा के बारीक पाउडर को दूध की लस्सी के साथ पिलाने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है। नाक में बरगद के दूध की 2 बूंदें डालने से नकसीर (नाक से खून बहना) ठीक हो जाती है।

4 - नींद का अधिक आना - बरगद के कड़े हरे शुष्क पत्तों के 10 ग्राम दरदरे चूर्ण को 1 लीटर पानी में पकायें, चौथाई बच जाने पर इसमें 1 ग्राम नमक मिलाकर सुबह-शाम पीने से हर समय आलस्य और नींद का आना कम हो जाता है।

5 - जुकाम - बरगद के लाल रंग के कोमल पत्तों को छाया में सुखाकर पीसकर रख लें। फिर आधा किलो पानी में इस पाउडर को 1 या आधा चम्मच डालकर पकायें, पकने के बाद थोड़ा सा बचने पर इसमें 3 चम्मच शक्कर मिलाकर सुबह-शाम चाय की तरह पीने से जुकाम और नजला आदि रोग दूर होते हैं और सिर की कमजोरी ठीक हो जाती है।

6 - हृदय रोग - 10 ग्राम बरगद के कोमल हरे रंग के पत्तों को 150 मिलीलीटर पानी में खूब पीसकर छानकर उसमें थोड़ी मिश्री मिलाकर सुबह-शाम 15 दिन तक सेवन करने से दिल की घड़कन सामान्य हो जाती है। बरगद के दूध की 4-5 बूंदे बताशे में डालकर लगभग 40 दिन तक सेवन करने से दिल के रोग में लाभ मिलता है।

7 - पैरों की बिवाई - बिवाई की फटी हुई दरारों पर बरगद का दूध भरकर मालिश करते रहने से कुछ ही दिनों में वह ठीक हो जाती है।

8 - कमर दर्द - कमर दर्द में बरगद़ के दूध की मालिश दिन में 3 बार कुछ दिन करने से कमर दर्द में आराम आता है। बरगद का दूध अलसी के तेल में मिलाकर मालिश करने से कमर दर्द से छुटकरा मिलता है।

9 - शक्तिवर्द्धक - बरगद के पेड़ के फल को सुखाकर बारीक पाउडर लेकर मिश्री के बारीक पाउडर मिला लें। रोजाना सुबह इस पाउडर को 6 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन से वीर्य का पतलापन, शीघ्रपतन आदि रोग दूर होते हैं।

10 - शीघ्रपतन - सूर्योदय से पहले बरगद़ के पत्ते तोड़कर टपकने वाले दूध को एक बताशे में 3-4 बूंद टपकाकर खा लें। एक बार में ऐसा प्रयोग 2-3 बताशे खाकर पूरा करें। हर हफ्ते 2-2 बूंद की मात्रा बढ़ाते हुए 5-6 हफ्ते तक यह प्रयोग जारी रखें। इसके नियमित सेवन से शीघ्रपतन, वीर्य का पतलापन, स्वप्नदोष, प्रमेह, खूनी बवासीर, रक्त प्रदर आदि रोग ठीक हो जाते हैं और यह प्रयोग बलवीर्य वृद्धि के लिए भी बहुत लाभकारी है।

11 - यौनशक्ति बढ़ाने हेतु  - बरगद के पके फल को छाया में सुखाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को बराबर मात्रा की मिश्री के साथ मिलाकर पीस लें। इसे एक चम्मच की मात्रा में सुबह खाली पेट और सोने से पहले एक कप दूध से नियमित रूप से सेवन करते रहने से कुछ हफ्तों में यौन शक्ति में बहुत लाभ मिलता है।

12 - नपुंसकता - बताशे में बरगद के दूध की 5-10 बूंदे डालकर रोजाना सुबह-शाम खाने से नपुंसकता दूर होती है। 3-3 ग्राम बरगद के पेड़ की कोंपले (मुलायम पत्तियां) और गूलर के पेड़ की छाल और 6 ग्राम मिश्री को पीसकर लुगदी सी बना लें फिर इसे तीन बार मुंह में रखकर चबा लें और ऊपर से 250 ग्राम दूध पी लें। 40 दिन तक खाने से वीर्य बढ़ता है और संभोग से खत्म हुई शक्ति लौट आती है।

13 - प्रमेह - बरगद के दूध की पहले दिन 1 बूंद 1 बतासे डालकर खायें, दूसरे दिन 2 बतासों पर 2 बूंदे, तीसरे दिन 3 बतासों पर 3 बूंद ऐसे 21 दिनों तक बढ़ाते हुए घटाना शुरू करें। इससे प्रमेह और स्वप्न दोष दूर होकर वीर्य बढ़ने लगता है।

14 - वीर्य रोग में - बरगद के फल छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें। गाय के दूध के साथ यह 1 चम्मच चूर्ण खाने से वीर्य गाढ़ा व बलवान बनता है।

25 ग्राम बरगद की कोपलें (मुलायम पत्तियां) लेकर 250 मिलीलीटर पानी में पकायें। जब एक चौथाई पानी बचे तो इसे छानकर आधा किलो दूध में डालकर पकायें। इसमें 6 ग्राम ईसबगोल की भूसी और 6 ग्राम चीनी मिलाकर सिर्फ 7 दिन तक पीने से वीर्य गाढ़ा हो जाता है। बरगद के दूध की 5-7 बूंदे बताशे में भरकर खाने से वीर्य के शुक्राणु बढ़ते है।

15 - उपदंश (सिफलिस) - बरगद की जटा के साथ अर्जुन की छाल, हरड़, लोध्र व हल्दी को समान मात्रा में लेकर पानी में पीसकर लेप लगाने से उपदंश के घाव भर जाते हैं। बरगद का दूध उपदंश के फोड़े पर लगा देने से वह बैठ जाती है। बड़ के पत्तों की भस्म (राख) को पान में डालकर खाने से उपदंश रोग में लाभ होता है।

16 - पेशाब की जलन - बरगद के पत्तों से बना काढ़ा 50 मिलीलीटर की मात्रा में 2-3 बार सेवन करने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है। यह काढ़ा सिर के भारीपन, नजला, जुकाम आदि में भी फायदा करता है।

17 - स्तनों का ढीलापन - बरगद की जटाओं के बारीक रेशों को पीसकर बने लेप को रोजाना सोते समय स्तनों पर मालिश करके लगाते रहने से कुछ हफ्तों में स्तनों का ढीलापन दूर हो जाता है। बरगद की जटा के बारीक अग्रभाग के पीले व लाल तन्तुओं को पीसकर लेप करने से स्तनों के ढीलेपन में फायदा होता है।

18 - गर्भपात होने पर - 4 ग्राम बरगद की छाया में सुखाई हुई छाल के चूर्ण को दूध की लस्सी के साथ खाने से गर्भपात नहीं होता है। बरगद की छाल के काढ़े में 3 से 5 ग्राम लोध्र की लुगदी और थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करने से गर्भपात में जल्द ही लाभ होता है। योनि से रक्त का स्राव यदि अधिक हो तो बरगद की छाल के काढ़ा में छोटे कपड़े को भिगोकर योनि में रखें। इन दोनों प्रयोग से श्वेत प्रदर में भी फायदा होता है।

19 - योनि का ढीलापन - बरगद की कोपलों के रस में फोया भिगोकर योनि में रोज 1 से 15 दिन तक रखने से योनि का ढीलापन दूर होकर योनि टाईट हो जाती है।

20 - गर्भधारण करने हेतु - पुष्य नक्षत्र और शुक्ल पक्ष में लाये हुए बरगद की कोपलों का चूर्ण 6 ग्राम की मात्रा में मासिक-स्राव काल में प्रात: पानी के साथ 4-6 दिन खाने से स्त्री अवश्य गर्भधारण करती है, या बरगद की कोंपलों को पीसकर बेर के जितनी 21 गोलियां बनाकर 3 गोली रोज घी के साथ खाने से भी गर्भधारण करने में आसानी होती है।

21 - गर्भकाल की उल्टी - बड़ की जटा के अंकुर को घोटकर गर्भवती स्त्री को पिलाने से सभी प्रकार की उल्टी बंद हो जाती है।

22 - रक्तप्रदर - 20 ग्राम बरगद के कोमल पत्तों को 100 से 200 मिलीलीटर पानी में घोटकर रक्तप्रदर वाली स्त्री को सुबह-शाम पिलाने से लाभ होता है। स्त्री या पुरुष के पेशाब में खून आता हो तो वह भी बंद हो जाता है।

10 ग्राम बरगद की जटा के अंकुर को 100 मिलीलीटर गाय के दूध में पीसकर और छानकर दिन में 3 बार स्त्री को पिलाने से रक्तप्रदर में लाभ होता है। बरगद के दूध की 5-7 बूंदे बताशे में भरकर खाने से रक्तप्रदर मिट जाता है।

23 - भगन्दर - बरगद के पत्ते, सौंठ, पुरानी ईंट के पाउडर, गिलोय तथा पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण समान मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर लेप करने से भगन्दर के रोग में फायदा होता है।

24 - बादी बवासीर - 20 ग्राम बरगद की छाल को 400 मिलीलीटर पानी में पकायें, पकने पर आधा पानी रहने पर छानकर उसमें 10-10 ग्राम गाय का घी और चीनी मिलाकर गर्म ही खाने से कुछ ही दिनों में बादी बवासीर में लाभ होता है।

25 - खूनी बवासीर - बरगद के 25 ग्राम कोमल पत्तों को 200 मिलीलीटर पानी में घोटकर खूनी बवासीर के रोगी को पिलाने से 2-3 दिन में ही खून का बहना बंद होता है। बवासीर के मस्सों पर बरगद के पीले पत्तों की राख को बराबर मात्रा में सरसों के तेल में मिलाकर लेप करते रहने से कुछ ही समय में बवासीर ठीक हो जाती है।
बरगद की सूखी लकड़ी को जलाकर इसके कोयलों को बारीक पीसकर सुबह-शाम 3 ग्राम की मात्रा में ताजे पानी के साथ रोगी को देते रहने से खूनी बवासीर में फायदा होता है। कोयलों के पाउडर को 21 बार धोये हुए मक्खन में मिलाकर मरहम बनाकर बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से बिना किसी दर्द के दूर हो जाते हैं।

26 - खूनी दस्त - दस्त के साथ या पहले खून निकलता है। उसे खूनी दस्त कहते हैं। इसे रोकने के लिए 20 ग्राम बरगद की कोपलें लेकर पीस लें और रात को पानी में भिगोंकर सुबह छान लें फिर इसमें 100 ग्राम घी मिलाकर पकायें, पकने पर घी बचने पर 20-25 ग्राम तक घी में शहद व शक्कर मिलाकर खाने से खूनी दस्त में लाभ होता है।

27 - दस्त - बरगद के दूध को नाभि के छेद में भरने और उसके आसपास लगाने से अतिसार (दस्त) में लाभ होता है। 6 ग्राम बरगद की कोंपलों को 100 मिलीलीटर पानी में घोटकर और छानकर उसमें थोड़ी मिश्री मिलाकर रोगी को पिलाने से और ऊपर से मट्ठा पिलाने से दस्त बंद हो जाते हैं।
बरगद की छाया मे सुखाई गई 3 ग्राम छाल को लेकर पाउड़र बना लें और दिन मे 3 बार चावलों के पानी के साथ या ताजे पानी के साथ लेने से दस्तों में फायदा मिलता है। बरगद की 8-10 कोंपलों को दही के साथ खाने से दस्त बंद हो जाते हैं।

28 - आंव - लगभग 5 ग्राम की मात्रा में बड़ के दूध को सुबह-सुबह पीने से आंव का दस्त समाप्त हो जाता है।

29 - मधुमेह - 20 ग्राम बरगद की छाल और इसकी जटा को बारीक पीसकर बनाये गये चूर्ण को आधा किलो पानी में पकायें, पकने पर अष्टमांश से भी कम बचे रहने पर इसे उतारकर ठंडा होने पर छानकर खाने से मधुमेह के रोग में लाभ होता है। लगभग 24 ग्राम बरगद के पेड़ की छाल लेकर जौकूट करें और उसे आधा लीटर पानी के साथ काढ़ा बना लें। जब चौथाई पानी शेष रह जाए तब उसे आग से उतारकर छाने और ठंडा होने पर पीयें। रोजाना 4-5 दिन तक सेवन से मधुमेह रोग कम हो जाता है। इसका प्रयोग सुबह-शाम करें।

30 - उल्टी - लगभग 3 ग्राम से 6 ग्राम बरगद की जटा का सेवन करने से उल्टी आने का रोग दूर हो जाता है।

31 - मुंह के छाले - 30 ग्राम वट की छाल को 1 लीटर पानी में उबालकर गरारे करने से मुंह के छाले खत्म हो जाते हैं।

32 - घाव - घाव में कीड़े हो गये हो, बदबू आती हो तो बरगद की छाल के काढ़े से घाव को रोज धोने से इसके दूध की कुछ बूंदे दिन में 3-4 बार डालने से कीड़े खत्म होकर घाव भर जाते हैं। साधारण घाव पर बरगद के दूध को लगाने से घाव जल्दी अच्छे हो जाते हैं। अगर घाव ऐसा हो जिसमें कि टांके लगाने की जरूरत पड़ जाती है। तो ऐसे में घाव के मुंह को पिचकाकर बरगद के पत्ते गर्म करके घाव पर रखकर ऊपर से कसकर पट्टी बांधे, इससे 3 दिन में घाव भर जायेगा, ध्यान रहे इस पट्टी को 3 दिन तक न खोलें। फोड़े-फुन्सियों पर इसके पत्तों को गर्मकर बांधने से वे शीघ्र ही पककर फूट जाते हैं।

33 - नासूर बरगद के दूध में सांप की केंचुली की राख मिलाकर और उसमें रूई भिगोकर नासूर पर रखें। दस दिन तक इसी प्रकार करने से नासूर में लाभ मिलता है।

34 फोड़े-फुंसियों के लिए    बरगद के पेड़ के दूध को फोड़े पर लगाने से फोड़ा पककर फूट जाता है। बरगद के नये पत्तों को आग के ऊपर से ही हल्का-सा गर्म करके उसके ऊपर थोड़ा-सा तेल लगाकर बांधने से फोड़े फुंसियां ठीक हो जाती हैं।

35 - कुष्ठ (कोढ़) - रात के समय बरगद के दूध का लेप करने तथा कोढ़ पर बरगद की छाल का चूर्ण बांधने से 7 दिन में ही कोढ़ और रोमक शांत हो जाता है।

36 - रसौली - कूठ व सेंधानमक को बरगद के दूध में मिलाकर लेप करें, तथा ऊपर से छाल का पतला टुकड़ा बांध दें, इसे 7 दिन तक 2 बार उपचार करने से बढ़ी हुआ गांठ दूर हो जाती है। गठिया, चोट व मोच पर बरगद का दूध लगाने से दर्द जल्दी कम होता है।

37 - खुजली - बरगद के आधा किलो पत्तों को पीसकर, 4 किलो पानी में रात के समय भिगोकर सुबह ही पका लें। एक किलो पानी बचने पर इसमें आधा किलो सरसों का तेल डालकर दोबारा पकायें, तेल बचने पर छानकर रख लें, इस तेल की मालिश करने से गीली और खुश्क दोनों प्रकार की खुजली दूर होती है।

38 - दांत मजबूत करना - बरगद की पेड़ की टहनी या इसकी शाखाओं से निकलने वाली जड़ की दातुन करने से दांत मजबूत होते हैं।

39 - दांत के कीड़े - कीड़े लगे या सड़े हुए दांतों में बरगद का दूध लगाने से कीड़े तथा पीड़ा दूर हो जाती है।

40 - दांत दर्द - 10 ग्राम बरगद की छाल, कत्था और 2 ग्राम कालीमिर्च इन तीनों को खूब बारीक पाउडर बनाकर मंजन करने से दांतों का हिलना, मैल, बदबू आदि रोग दूर होकर दांत साफ हो जाते हैं। दांत के दर्द पर बरगद का दूध लगाने से दर्द दूर हो जाता है। इसके दूध में एक रूई की फुरेरी भिगोकर दांत के छेद में रख देने से दांत की बदबू दूर होकर दांत ठीक हो जाते हैं तथा दांत के कीड़े भी दूर हो जाते हैं। अगर किसी दांत को निकालना हो तो उस दांत पर बरगद का दूध लगाकर दांत को आसानी से निकाला जा सकता है। बरगद के पेड़ की जटा से मंजन करने से दांतों के कीड़े खत्म हो जाते हैं। बरगद की कोमल लकड़ी की दातुन से पायरिया खत्म हो जाता है। बरगद का दूध दांतों में लगाने, मसूढ़ों पर मलने से उनका दर्द दूर हो जाता है। बरगद की छाल के काढ़े से कुछ समय तक रोजाना गरारे करने से दांत मजबूत हो जाते हैं। बरगद के पेड़ का दूध निकालकर दांतों लगाने से दांतों का दर्द खत्म हो जाता है। बरगद की छाल को पीसकर दांतों के नीचे रखें। इससे दांतों का दर्द खत्म हो जाता है।

41 - दर्द व सूजन में - बरगद के पत्तों पर घी चुपड़कर बांधने से सूजन दूर हो जाती है।

42 - गठिया - गठिया के दर्द में बरगद के दूध में अलसी का तेल मिलाकर मालिश करने से लाभ मिलता है।

42 - दमा - दमा के रोगी को बड़ के पत्ते जलाकर उसकी राख 240 मिलीग्राम पान में रखकर खाने से लाभ मिलता है।


भारत में बरगद के वृक्ष को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस वृक्ष को 'वट' के नाम से भी जाना जाता है। यह एक सदाबहार पेड़ है, जो अपने प्ररोहों के लिए विश्वविख्यात है। इसकी जड़ें ज़मीन में क्षैतिज रूप में दूर-दूर तक फैलकर पसर जाती है। इसके पत्तों से दूध जैसा पदार्थ निकलता है। 


बरगद एक विशाल, ऊँचा और बहुत बड़े क्षेत्र में फैलने वाला वृक्ष है। इसकी ऊँचाई 20 मीटर से 30 मीटर तक हो सकती है। प्राय: यह देखा गया है कि जंगल में स्वत: विकसित बरगद के तने अधिक मोटे नहीं होते। इसके विपरीत खुले एवं सूखे स्थानों पर पाये जाने वाले बरगद के तने अधिक मोटे होते हैं। इसका तना ऊपर उठकर अनेक शाखाओं और उपशाखाओं में विभक्त हो जाता है। इसकी शाखाओं और उपशाखाओं की एक विशेषता यह है कि ये चारों ओर फैली होती हैं। तने और शाखाओं की मोटाई एवं स्वरूप पर इसकी आयु का प्रभाव पड़ता है। छोटे और नये बरगद के वृक्षों का तना गोल और शाखाएँ चिकनी होती हैं तथा पुराने वृक्षों के तने और शाखाएँ खुरदरे एवं पपड़ी वाले होते हैं। इस प्रकार के वृक्षों के तनों के लम्बे, चौड़े घेरे गोल न होकर अनेक तारों जैसी जटाओं का समूह सा लगते हैं।

जटाएँ

बरगद की शाखाओं से जटाएँ निकलती हैं। आरम्भ में ये पतली होती हैं और नीचे की ओर झूलती रहती हैं। कुछ समय के बाद ये जमीन तक पहुँच जाती हैं और जमीन के भीतर से खाद्य रस लेने लगती हैं। धीरे धीरे इनका विकास होता है और एक लम्बे समय के बाद ये तने के समान मोटी, कठोर और मजबूत हो जाती हैं तथा वृक्ष का बोझ उठाने के लायक हो जाती हैं। बहुत पुराने बरगद के वृक्ष जटाओं से अपनी काया का बहुत अधिक विस्तार कर लेते हैं और एक लम्बे चौड़े क्षेत्र में फैल जाते हैं। इनके तनों और जटाओं में गुफा सी बन जाती है, जिनमें व्यक्ति बैठ सकते हैं या फिर सो सकते हैं। बरगद को इसकी लम्बी लम्बी जटाओं के कारण ही जटाजूटधारी महात्मा कहा जाता है।

पत्तियाँ

बरगद की पतली डालियों पर सभी तरफ बड़े और गोलाई लिए हुए अंडाकार पत्तियाँ निकलती हैं। किंतु एक स्थान से केवल एक पत्ती ही निकलती है। पत्तों की लंबाई 10 सेंटीमीटर से 20 सेंटीमीटर तथा चौड़ाई 5 सेंटीमीटर से 13 सेंटीमीटर तक होती है। बरगद के पत्ते काफ़ी मोटे होते हैं एवं एक छोटे से मजबूत डंठल द्वारा डाल से जुड़े रहते हैं। पत्ते एक तरफ से चिकने होते हैं और इनका रंग गहरा हरा होता है। पत्तों के दूसरी ओर का भाग चिकना नहीं होता और रंग हल्का हरा होता है। नये पत्ते प्राय: फ़रवरी-मार्च में निकलते हैं। कभी कभी सितम्बर-अक्टूबर में भी नये पत्ते निकल आते हैं। नये पत्ते लाली लिये हुए और बहुत ही सुन्दर होते हैं।

फल

वृक्ष पर गर्मियों के मौसम में फल आते हैं। सामान्यत: फ़रवरी से मई के मध्य में फल आते हैं और पकते हैं। कभी कभी सितम्बर तक ये फल देखे जा सकते हैं। कुछ स्थानों पर बरगद में विलम्ब से फल निकलते हैं और दिसम्बर तक बने रहते हैं। इसके फल छोटे, गोल और डंठल विहीन होते हैं। ये शाखाओं पर उन्हीं स्थानों पर निकलते हैं, जहाँ पत्ते निकलते हैं। इसके फल जोड़े में निकलते हैं एवं पास-पास और घने होते हैं। वास्तव में बरगद का फल एक विशेष प्रकार का पुष्प समूह होता है, जो गोल आकार लेकर फल बन जाता है। बरगद के फल के भीतर बहुत छोटे छोटे कीड़े होते हैं, इन्हें अंजीर कीट कहते हैं। इन कीड़ों के अभाव में बरगद का वृक्ष बीज उत्पन्न नहीं कर सकता। ये कीड़े एक फूल से दूसरे फूल में घुसते हैं, जिससे फूल के नर मादा क्षेत्र एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं और परागण की क्रिया पूरी होती है।

2016-01-07

मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज

मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज 


मोतियाबिंद एक आम समस्या बनता जा रहा है, अब तो युवा भी इस रोग के शिकार होने लगे हैं। अगर इस रोग का समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी अंधेपन का शिकार हो जाता है।

मोतियाबिंद क्या है?

मोतियाबिंद वो समस्या है, जब आंखों के प्राकृतिक (नैचुरल) लेंस के ऊपर एक परत जम जाती है। ये प्राकृतिक लेंस हमारी आंखों का ज़रूरी हिस्सा है। ये लेंस, प्रकाश पर फोकस करता है जिससे हमें सामने वाली चीज़ बिल्कुल साफ दिखाई देती है।

मोतियाबिंद होने की वजह क्या है?