Showing posts with label आस्था. Show all posts
Showing posts with label आस्था. Show all posts

2016-10-02

श्री दुर्गा सप्तशति बीजमंत्रात्मक साधना


श्री दुर्गा सप्तशति बीजमंत्रात्मक साधना

ओम श्री गणेशाय नमः
ओम ह्रुं जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः
ओम दुर्गे दुर्गे रक्षीणी ठः ठः स्वाहः

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम

ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे | ओम ग्लौं हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल  ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै
ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ||

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दीनि | नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि ||
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि | जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ||
ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका | क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते ||
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी | विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ||
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी | क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू ||
हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी | भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः ||
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं | धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ||
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा | सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ||
ओम नमश्चण्डिकायैः|ओम श्री दुर्गार्पणमस्तु||

2016-08-20

श्री हरि के रक्त से उत्पन्न हुई है क्षिप्रा

क्षिप्रा के तट पर अमृत का मेला 
श्री हरि के रक्त से उत्पन्न हुई है क्षिप्रा

उज्जैन की क्षिप्रा नदी, जहां हर १२ वर्ष बाद सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया जाता है। कुंभ विश्व का सबसे बड़ा मेला है। एक किंवदंती के अनुसार क्षिप्रा नदी विष्णु जी के रक्त से उत्पन्न हुई थी।

ब्रह्म पुराण में भी क्षिप्रा नदी का उल्लेख मिलता है। संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अपने काव्य ग्रंथ 'मेघदूत' में क्षिप्रा का प्रयोग किया है, जिसमें इसे अवंति राज्य की प्रधान नदी कहा गया है।

2016-07-02

शनि स्तोत्

दशरथ कृत शनि स्तोत्र
   
जो भी जातक शनि ग्रह, शनि साढ़ेसात‍ी, शनि ढैया या शनि की महादशा से पीड़ित हैं उन्हें दशरथ कृत शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। 


इस पाठ को नियमित करने से भगवान शनि प्रसन्न होते हैं तथा जीवन की समस्त परेशानियों से मुक्ति दिलाकर जीवन को मंगलमय बनाते हैं...


नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ  वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते।।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

2016-06-16

शस्त्र और शास्त्र के महारथी – परशुरामजी

शस्त्र और शास्त्र के महारथी – परशुराम

★★★★★★★★★★★★★★★

हमहि तुम्हहि सरिबरि कस नाथा, कहहु न कहां चरन कहं माथा।
राम मात्र लघु नाम हमारा, परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।


मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिनका सादर नमन करते हों, उन शस्त्रधारी और शास्त्रज्ञ भगवान परशुराम की महिमा का वर्णन शब्दों की सीमा में संभव नहीं। वे योग, वेद और नीति में निष्णात थे, तंत्रकर्म तथा ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में भी पारंगत थे, यानी जीवन और अध्यात्म की हर विधा के महारथी।

विष्णु के छठे अवतार परशुराम संहार और निर्माण, दोनों में कुशल परशुराम जाति नहीं, अपितु अवगुण विरोधी थे। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में –

2016-06-03

Hanuman Chalisa translated in english


हनुमान चालीसा का अंग्रेजी में अनुवाद

Hanuman Chalisa translated in English....

श्रीगुरु चरन सरोज रज बी
In the Lotus feet of my teacher/Guardian

निज मन मुकुर सुधारि।
I purify the mirror of my heart

बरनउँ रघुबर बिमल जसु
I illustrate the story of immaculate Rama

जो दायकु फल चारि॥
which bestows four fruits (The 4 Purusharth : desire, prosperity, righteousness, liberation)

बुद्धिहीन तनु जानिकै
Considering myself as frail & unwise

सुमिरौं पवनकुमार।
I contemplate Son of Wind (Hanuman)

बल बुद्धिविद्या देहु मोहिं
to impart power, knowledge & civilization

हरहु कलेश विकार ॥
& to eradicate all the miseries of life.

2016-05-28

नागा साधु, जानें, इनकी यात्रा का रहस्य


कुंभ खत्म होते रातों-रात गायब होते हैं नागा साधु, जानें, इनकी यात्रा का रहस्य        

 सिंहस्थ की पहचान बने नागा साधु आखरी शाही स्नान कर रात में ही उज्जैन से रवाना हो गए। एक महीने तक सिंहस्थ की शान नागा साधुओं के एकाएक गायब होने से लोग हैरान हैं। हैरानी का कारण ये भी है कि किसी भी कुम्भ में नागा साधुओं को आते और जाते कभी कोई नहीं देख पाता। सिंहस्थ में हजारों की संख्या में नागा साधु आए और चले भी गए, लेकिन किसी ने भी ना तो उन्हें आते हुए देखा और ना ही जाते हुए।

- वे कहां से आए, कैसे आए और कहां गायब हो गए, इसकी चर्चा अब शहर में हर कोई कर रहा है।

- *जब नागा साधुओं की इस यात्रा के बारे में जानकारी हासिल की तो कई रहस्य सामने आए।*---

- राष्ट्रीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी जी महाराज के मुताबिक, नागा साधु जंगल के रास्तों से यात्रा करते हैं। आमतौर पर ये लोग देर रात में चलना शुरू करते हैं।

- यात्रा के दौरान ये लोग किसी गांव या शहर में नहीं जाते, बल्कि जंगल और वीरान रास्तों में डेरा डालते हैं।

- रात में यात्रा और दिन में जंगल में विश्राम करने के कारण सिंहस्थ में आते या जाते हुए ये किसी को नजर नहीं आते।

- कुछ नागा साधु झुंड में निकलते है तो कुछ अकेले ही यात्रा करते हैं। ये लोग यात्रा में कंदमूल फल, फूल और पत्तियों का सेवन करते हैं।

- यात्रा के दौरान नागा साधु जमीन पर ही सोते हैं।

*ऐसे मिलती है कुंभ या सिंहस्थ में शामिल होने की सूचना ...*--

- नरेंद्र गिरी महाराज के अनुसार, हर अखाड़े में एक कोतवाल होता है। ये कोतवाल नागा साधुओं और अखाड़ों के बीच की कड़ी का काम करता है।

- दीक्षा पूरी होने के बाद जब साधु अखाड़ा छोड़कर साधना करने जंगल या कंदराओं में चले जाते हैं तो ये कोतवाल उन्हें अखाड़ों की सूचनाएं पहुंचाता है।

2016-05-02

गंगा का माहात्म्य

गंगा सिर्फ एक नदी का नाम नहीं

 गंगा सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवनदायी है। गंगा की लहरों ने न जाने कितनी सभ्यताओं व संस्कृतियों को बनते बिगड़ते देखा। वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक के उत्थान-पतन का गवाह है गंगा। राजनीति, अर्थनीति, सामाजिक व्यवस्था से लेकर धर्म, अध्यात्म, पर्यटन, पर्यावरण तक सब इससे प्रभावित होते रहे हैं। एक ही गंगा के न जाने कितने रूप हैं, हर कोई उसे अपने-अपने नजरिए से विश्लेषित करता है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित जरूरतों को पूरा करती हैं। राष्ट्रीय नदी गंगा भारत की सबसे लंबी नदी है जो पर्वतों, घाटियों और मैदानों में 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। तभी तो इसे माँ कहा गया है। इसकी गोद में न जाने कितनों का विकास हुआ, प्रभाव बढ़ा और आज भी गंगा तट के बाशिंदों को गर्व है कि वे माँ गंगा के सानिध्य में फलते-फूलते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने गंगा को भुक्ति-मुक्ति दायिनी कहा है। गंगा जी के बारे में तुलसीदास की चौपाई हैः- दरश्, परस, मज्जन अरु पाना। हरहिं पाप, कह वेद पुराना।। अर्थात, गंगा जी के दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। वैसे भी, गंगा को शास्त्रों में ब्रह्म द्रव कहा गया है। सीधे शब्दों में कहें तो गंगा हमारी जरूरतों को भी पूरा करती हैं और मुक्ति भी दिलाती है। यानी हमारी भुक्ति-मुक्ति दोनों का साधन बनती है। गंगा नदी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। यह करोड़ों लोगों के लिए जीवन रेखा और आस्था का प्रतीक है।

गंगा का माहात्म्य

माहात्म्य - महत् होने की अवस्था या भाव। गौरव। महिमा। आदर-सम्मान।  धार्मिक क्षेत्र में किसी पवित्र या पुण्य-कार्य से अथवा किसी स्थान के महत्त्व का वर्णन। 

नारदजी को ब्रह्माजी ने कहा की गंगा का माहात्म्य  इतना व्यापक हें, उसके वारे में सब जानते हें | श्रीविष्णु के चरणों से निकली गंगा को सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने अपने कमंडल में धारण किया था | जहाँ से वह गौतम  मुनि के प्रयासों से पृथ्वी पर आई |  

परम पवित्र गंगा के पृथ्वी पर आने पर रत्नाकर सागर ने यह सोचा की यदि देव त्रिमूर्ति द्वारा और समस्त लोको द्वारा पूजी गई गंगाजी स्वागत के लिय मैने प्रयन्त नही किया तो यह पूज्य पुरषों की अवमानना होगी और मेरा अपराध अक्षम्य हो जायेगा | मन में यह सोच कर रत्नाकर सागर गंगाजी की शरण में जाकर कहाँ की में पृथ्वी, आकाश और पाताल में उपस्थित समस्त जलराशि को अपने में समाने में समर्थ हूं और प्रस्तुत हूं | मेरे भीतर अमृत औषाधियॉ, पर्वत, राक्षस, अनेक रत्न और अनेक जीव निवास करते हें | लक्ष्मीजी के साथ श्रीविष्णु भी मुझमें शयन करते हें | इसके वावजूद में आपके गौरव के सामने नमन करता हूं, और निवेदन करता हूं की आप मेरे साथ समागम करें | तब गंगाजी ने कहा की वह सात-ऋषियों को सपत्नीक मेरे पास लाये तभी में उनकी उपस्थति में आपके साथ चल सकती हूं | रत्नाकर सागर ने एसा ही किया और गंगाजी की सात धाराओं के लघु रूप को धारण कर गंगाजी ने सागर ( समुद्र) के साथ गमन किया |

           गंगा का अपना इतिहास हें, गंगा भगवान शिव की जटाओं में,  जब से आई तब से वह उन्हें प्रिय हें | गंगाजी के प्रति शिवजी का यह भाव उनकी पत्नी पार्वती को सहन नही हुआ | उन्होंने अपने पति शिव की उपेक्षा देखकर अपने पुत्र गणेश कहा, हें पुत्र गणेश ! गंगा को मेरे पति से अलग करो | क्योंकि शिव के गंगाजी के साथ रहने पर सभी देवता वहां निवास करते हें | ऐसी दशा में पार्वती को गंगा में अपनी सपत्नी होने का आभास होता हें |  

         गौतम मुनि ने पूर्वकाल में अपनी तपस्या से भगवान् शिव को प्रसन्न कर गंगा को मांग लिया था, साथ ही यह वरदान भी माँगा था कि जटा से निकली गंगा के समुद्र तक जाने के मार्ग में सर्वत्र भगवान शिव साक्षात् रूप से स्वयमविध्मान रहेंगे | शिवजी ने गौतम मुनि  को यह वरदान सहर्ष दिया था |

        इसलिय शिवजी को गंगा से अलग नही किया जा सकता | तब से गंगा-स्नान में विघ्न डालने वाले ये भगवान् गणेश मनुष्यों के मार्ग में रूकावटे पैदा करते हें | जो मनुष्य उन विघ्नों को पार करता हुआ अपनी अटूट भक्ति से गंगा के प्रति समर्पित होकर उनका सेवन करता हें, वह कृतार्थ हो जाता हें |




2016-04-15

सत्पुरुष गुरु समर्थ रामदास

आध्यात्मिक सत्पुरुष गुरु समर्थ रामदास

मुखमण्डलपर दाढ़ी, मस्तकपर जटाएँ,भालप्रदेश पर चन्दन का टीका,कंधेपर भिक्षा के लिए झोली तथा एक हाथ में जपमाला व कमण्डलु और दूसरे हाथ में योगदण्ड (कुबड़ी) लिए व पैरोंमें लकड़ी कीपादुकाएँ धारण किये भक्ति, ज्ञान व वैराग्य से ओत-प्रोत व्यक्तित्व के स्वामी समर्थ रामदास भारत के ऐसे सन्त हैं, जिनकी महाराष्ट्र तथा सम्पूर्ण दक्षिण भारत में प्रत्यक्ष हनुमान जी के अवतार के रूप में पूजा की जातीहै ।भारत के साधु-सन्तों व विद्वत समाज में लोकख्यात आध्यात्मिक सत्पुरुष गुरु समर्थ स्वामीरामदास के जन्मस्थल जाम्बगाँव में तो उनकी मूर्ति मन्दिर में स्थापित की गयी है। कहा जाता है कि समर्थ रामदास के मूर्ति स्थापना के समय अनेक विद्वानों ने कहा कि मनुष्यों की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा देवताओं के समान नहीं की जा सकती, परन्तु समर्थ रामदास के हनुमान जी के अवतार वाली जन मान्यता के सम्मुख उन्हें झुकना पड़ा।योगशास्त्र के अनुसार उनकी भूचरी मुद्रा थी। मुखमें सदैव रामनाम का जाप चलता था और बहुत कम बोलते थे। 

2016-04-07

क्या बताये इस भभूति का, यह तो कूबेर का खजाना है


सिंहस्थ में साधु-संतों का आना अब जोर पकड़ने लगा है। इन दिनों मेला क्षेत्र में साधु-संतों एवं सन्यासियों के दर्शनों और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं का आवागमन बढ़ने लगा है। दत्त अखाड़ा क्षेत्र में यह दृश्य आसानी से देखे जा सकते हैं। 

2016-03-29

श्री अक्रूरेश्वर महादेव

श्री अक्रूरेश्वर महादेव

कहाँ स्थित है?

उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री अक्रूरेश्वर महादेव का मंदिर अंकपात क्षेत्र में राम जनार्दन मंदिर के पास स्थित है। अंकपात क्षेत्र के पीछे भी बड़ी रोचक कथा है। उज्जयिनी स्थित संदीपनी आश्रम भगवान कृष्ण की शिक्षास्थली है। आश्रम परिसर में ही एक कुंड है और माना जाता है कि इस कुंड के ज़रिये श्री कृष्ण अपने गुरु के लिए गोमती नदी को यहां तक लेकर आये इसलिए इसे गोमती कुंड कहा जाता है। इसी गोमती कुंड के जल से श्री कृष्ण अपनी पाटी (भोजपत्र) साफ किया करते थे। इस दौरान उनके लिखे अंक कुंड में गिरे थे और फलस्वरूप इस क्षेत्र को विद्वानो का क्षेत्र कहा जाने लगा। इसी कारण इस क्षेत्र को अंकपात कहा जाता है।


अंकपादाग्रतो लिंगम सप्त कल्पानुगं महत।
यस्य दर्शनमात्रेण शुभाम् बुद्धिः प्रजायते। ।


श्री अक्रूरेश्वर महादेव की कहानी शिव पार्वती की एकरूपता को वर्णित करती है। प्रस्तुत कहानी में क्रूर बुद्धि के दोषों को दर्शाया गया है और सौम्य बुद्धि की महत्ता दर्शाई गई है।

पौराणिक आधार एवं महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता पार्वती ने शक्ति रूप धारण किया था और वे अत्याधिक क्रोधित हो गईं थी। उस समय चर, अचर, देवता, किन्नर, समस्त गणों, इत्यादि ने उनकी प्रदक्षिणा एवं स्तुति की थी। केवल एक भृंगिरीट गण ने उन्हें नमस्कार नहीं किया था, ना ही स्तुति की थी। भृंगिरीट का कथन था कि वे शिवजी के पुत्र हैं और उनकी ही शरण में हैं, माँ पार्वती की नहीं। इस पर माता पार्वती ने क्रोधित हो भृंगिरीट को पृथ्वी लोक में दंड भुगतने का शाप दे दिया। माता के शाप से तुरंत ही भृंगिरीट पृथ्वी लोक पर गिर पड़ा। शाप से व्यथित हो भृंगिरीट पुष्कर द्वीप में जा तपस्या करने लगा। उसके कठिन तप से ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, आदि उसके पास गए और उसके शाप के बारे में जानकर भगवान शंकर के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया। तब भगवान शंकर ने भृंगिरीट से कहा कि तुम प्रजा को दुःख देने वाले तप को बंद करो। शापमुक्त होने के लिए तुम पार्वती जी की प्रार्थना करो, उनकी प्रसन्नता से ही तुम शाप मुक्त हो सकते हो।

शिवजी की बात सुन उसने श्रद्धापूर्वक माँ पार्वती की स्तुति की जिसके फलस्वरूप माता ने प्रसन्न हो कहा कि तुम महाकाल वन जाओ। वहाँ अंकपात क्षेत्र के आगे एक दिव्य लिंग है, उसके पूजन अर्चन करो। उस लिंग के दर्शन से तुम्हारी क्रूरता दूर होगी एवं बुद्धि निर्मल होगी। इससे तुम्हें पृथ्वी लोक से मुक्ति मिलेगी और पुनः कैलाश वास प्राप्त होगा। बलराम और कृष्ण ने भी क्रूर होकर कंस और केशी राक्षस का वध किया था। उसके पश्चात वे भी मथुरा से महाकाल वन आये थे और दिव्य लिंग का पूजन कर अक्रूर (सौम्य स्वभाव) हुए। तब माता की बात सुन भृंगिरीट महाकाल वन पहुंचा और बताये हुए दिव्य लिंग की आराधना की। उसके पूजन के फलस्वरूप लिंग में से अर्धनारीश्वर के रूप में शिव पार्वती प्रकट हुए। तब भृंगिरीट को ज्ञात हुआ कि शिव और पार्वती का सनातन देह एक ही है। इस तरह भृंगिरीट की बुद्धि निर्मल हुई और तभी से यह दिव्य लिंग अक्रूरेश्वर (अक्रूरेश्वर यानी बुद्धि को सौम्य करने वाले) कहलाया।

दर्शन लाभ
मान्यतानुसार श्री अक्रूरेश्वर महादेव के दर्शन करने से बुद्धि सौम्य होती है एवं क्रूरता कम होती है।

2016-03-28

श्री महाकालेश्वर मंदिर

भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का स्थान प्रमुख है। तांत्रिक परम्परा में मात्र महाकाल को ही दक्षिण मूर्ति पूजा का महत्व प्राप्त है। इसका वर्णन महाभारत, स्कन्दपुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिवपुराण, भागवत, शिवलीलामृत आदि ग्रंथों में आता है। वर्तमान मंदिर तीन भाग में सबसे नीचे श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग’ उसके ऊपर ’श्री ओकारेश्वर’ एवं सबसे ऊपर श्री नागचंद्रेश्वर है। 

श्री महाकालेश्वर मंदिर के दक्षिण दिशा में श्री वृद्धमहाकालेश्वर एवं श्री सप्तऋषि के मंदिर हैं। इस मंदिर का वर्णन महाभारत, स्कन्द पुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिव पुराण, भागवत्, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थां में तथा कथासरित्सागर, राजतरंगिणी, कादम्बरी, मेघदूत, रघुवंश आदि काव्यां में इस देवालय का अत्यन्त सुन्दर वर्णन दिया गया है। 

2016-03-24

जय बाबा श्री रामदेव जी की आरती

जय बाबा री जय बाबा रामदेवजी की
श्री रामदेव जी की आरती

पिछम धरां सूं म्हारा पीर जी पधारिया।
घर अजमल अवतार लियो
लाछां सुगणा करे थारी आरती।
हरजी भाटी चंवर ढोले।
पिछम धरां सूं म्हारा पीर जी पधारिया।

गंगा जमुना बहे सरस्वती।
रामदेव बाबो स्नान करे।
लाछां सुगणा करे थारी आरती।
हरजी भाटी चंवर ढोले।
पिछम धरां सूं म्हारा पीर जी पधारिया।


2016-03-22

धन्य धन्य जिनशासन

आपको कोई कहे कि ऐसा व्यक्ति ढूंढकर लाओ जो ज़िन्दगी भर बिजली का उपयोग न करता हो , वाहन में न बैठता हो ,  बैंक में जिसका खाता न हो , जिसके पास रहने के लिए घर न हो , गांव में खेत न हो , जो पैसा न कमाता हो , जो विवाह न करता हो , जिसका परिवार न हो , पैर में जुते न पहनता हो , जिसके पास राशन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पैन कार्ड, ड्राईविंग लाईसेंस आदि न हो , जिसे पासपोर्ट की जरुरत न हो ,

2016-01-07

गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं?

रहस्य: गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं?


पतितपावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है। मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है।

श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध होने पर गंगा को पतित पाविनी कहा जाता है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है। एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"

इस पर श्री हरि बोले,"गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आ कर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"

गंगा नदी इतनी पवित्र है की प्रत्येक हिंदू की अंतिम इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती कहां हैं?


2015-11-25

हाथ में मौली कलावा क्यों बांधा जाता है

क्या आप जानते हैं कि.....

हमारे हिन्दू परम्पराओं के अनुसार ... हाथ में मौली (लच्छा/कलावा) क्यों बांधा जाता है...?????

आपने अक्सर देखा होगा कि..... घरों और मंदिरों में पूजा के बाद पंडित जी हमारी कलाई पर लाल रंग का कलावा या मौली बांधते हैं.... और, हम में से बहुत से लोग बिना इसकी जरुरत को पहचाते हुए इसे हाथों में बंधवा लेते हैं...।

सिर्फ इतना ही नहीं... बल्कि, .... आजकल पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े लोग .... मौली बांधने कोएक ढकोसला मानते हैं .... और, उनका मजाक उड़ाते हैं...!

2015-10-18

माता कात्यायनी की पूजा

नवरात्री दुर्गा पूजा छठा तिथि – माता कात्यायनी की पूजा :

माँ दुर्गा के छठे रूप को माँ कात्यायनी के नाम से पूजा जाता है. महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं. महर्षि कात्यायन ने इनका पालन-पोषण किया तथा महर्षि कात्यायन की पुत्री और उन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण देवी दुर्गा को कात्यायनी कहा गया.

देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है, माँ कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं. देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है. इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है. योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं. साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है.

2015-10-01

भरोसा

भरोसा !!!

एक बार एक अत्यंत गरीब महिला जो ईश्वरीय शक्ति पर बेइंतिहा विश्वास करती थी।

एक बार अत्यंत ही विकट स्थिति में आ गई। कई दिनों से खाने के लिए पुरे परिवार को नहीं मिला।

एक दिन उसने रेडियो के माध्यम से ईश्वर को अपना सन्देश भेजा कि वह उसकी मदद करे।


यह प्रसारण एक नास्तिक  ,घमण्डी और अहंकारी उद्योगपति ने सुना और उसने सोचा कि क्यों न इस महिला साथ कुछ ऐसा मजाक किया जाये कि उसकी ईश्वर के प्रति आस्था डिग जाय।

2015-09-30

श्राद्ध करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

श्राद्ध करते समय ध्यान रखने योग्य बातें


----------------------

धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

2015-09-19

कीर्तन की महिमा

संकीर्तन महिमा 




कलियुग में नाम संकीर्तन के अलावा जीव के उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है| 

बृहन्नार्दीय पुराण में आता है–

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलं|

कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा||


कलियुग में केवल हरिनाम, हरिनाम और हरिनाम से ही उद्धार हो सकता है| हरिनाम के अलावा कलियुग में उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है! नहीं है! नहीं है!  

 कृष्ण तथा कृष्ण नाम अभिन्न हैं: कलियुग में तो स्वयं कृष्ण ही हरिनाम के रूप में अवतार लेते हैं| केवल हरिनाम से ही सारे जगत का उद्धार संभव है–

कलि काले नाम रूपे कृष्ण अवतार | 
नाम हइते सर्व जगत निस्तार||    – चै॰ च॰ १.१७.२२


पद्मपुराण में कहा गया है–

नाम: चिंतामणि कृष्णश्चैतन्य रस विग्रह:|
पूर्ण शुद्धो नित्यमुक्तोSभिन्नत्वं नाम नामिनो:||


2015-08-29

रक्षा बंधन का शुभ मुहूर्त

श्रावण पूर्णिमा के दिन शनिवार 29 अगस्त को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन दोपहर 1.50 बजे तक भद्राकाल होने के कारण राखी बांधने का शुभ मुहूर्त इसके बाद ही है। भद्राकाल में राखी बांधना शास्त्रों में वर्जित माना गया है। ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि भाई-बहन के पावन प्रेम के प्रतीक रक्षाबंधन पर इस बार भी लोगों को अपनी कलाई पर राखी बंधवाने के लिए दोपहर तक इंतजार करना पड़ेगा। यह संयोग ही है कि वर्ष 2013, 2014 के बाद अब 2015 में लगातार तीसरे साल रक्षाबंधन पर भद्रा की साया है। दोपहर 1.50 तक भद्रा होने की वजह से भाइयों की कलाइयां सज सकेंगी।