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2016-12-13

You  Start  Dying  Slowly आप मरने लगते हैं अगर

You  Start  Dying  Slowly

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,  अगर...
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नोबेल पुरस्कार विजेता स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता  "You  Start  Dying  Slowly" का हिन्दी अनुवाद...
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप करते नहीं कोई यात्रा,
अगर आप पढ़ते नहीं कोई किताब,
अगर आप सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
अगर आप करते नहीं किसी की तारीफ़,
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,
जब आप मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
जब आप नहीं करने देते मदद अपनी,
न करते हैं मदद दूसरों की,
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं,
अगर आप बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,

2016-09-25

अकेलापन संसार में सबसे बड़ी सजा है।

मेरे  पति ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक छोटा सा गार्डन बना लिया। पिछले दिनों मैं छत पर गई तो ये देख कर हैरान रह गई कि कई गमलों में फूल खिल गए हैं,नींबू के पौधे में दो नींबू भी लटके हुए हैं और दो चार हरीमिर्च भी लटकी हुई नज़रआई।

मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस का जो पौधा गमले में लगाया था,उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रहे थे |

मैं बोली आप इस भारी गमले को क्यों घसीट रहे हो ?

पतिदेव ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं।

2016-08-13

शिवलिंग

शिवलिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतिमा पृथ्वी पर कभी नहीं खोजी गई। उसमें आपकी आत्मा का पूरा आकार छिपा है। और आपकी आत्मा की ऊर्जा एक वर्तुल में घूम सकती है, यह भी छिपा है। और जिस दिन आपकी ऊर्जा आपके ही भीतर घूमती है और आप में ही लीन हो जाती है, उस दिन शक्ति भी नहीं खोती और आनंद भी उपलब्ध होता है। और फिर जितनी ज्यादा शक्ति संगृहीत होती जाती है, उतना ही आनंद बढ़ता जाता है।

हमने शंकर की प्रतिमा को, शिव की प्रतिमा को अर्धनारीश्वर बनाया है। शंकर की आधी प्रतिमा पुरुष की और आधी स्त्री की- यह अनूठी घटना है। जो लोग भी जीवन के परम रहस्य में जाना चाहते हैं, उन्हें शिव के व्यक्तित्वको ठीक से समझना ही पड़ेगा।और देवताओं को हमने देवता कहा है, शिव को महादेव कहा है। उनसे ऊंचाई पर हमने किसी को रखा नहीं। उसके कुछ कारण हैं।

2016-08-01

जिंदगी आईसक्रीम की तरह है


एक  नगर  में  एक  मशहूर  चित्रकार  रहता था ।  चित्रकार  ने  एक  बहुत  सुन्दर तस्वीर  बनाई और उसे  नगर  के  चौराहे  मे  लगा  दिया  और   नीचे  लिख  दिया  कि  जिस किसी  को , जहाँ  भी   इस में  कमी  नजर  आये  वह  वहाँ  निशान  लगा  दे । जब  उसने  शाम  को  तस्वीर देखी   उसकी  पूरी  तस्वीर  पर  निशानों  से  ख़राब  हो  चुकी थी । यह  देख  वह  बहुत  दुखी  हुआ । उसे कुछ  समझ  नहीं  आ  रहा  था  कि  अब  क्या  करे  वह  दुःखी  बैठा  हुआ  था  ।  तभी  उसका एक मित्र  वहाँ  से  गुजरा  उसने  उस  के  दुःखी होने  का  कारण  पूछा  तो  उसने  उसे  पूरी  घटना बताई ।  

2016-07-31

पिंजरे का तोता

पिंजरे का तोता

एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे। सेठजी के एक घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था। तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि सेठजी आप रोज कहाँ जाते है। सेठजी बोले कि भाई सत्संग में ज्ञान सुनने जाते है। तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ। तब सेठजी कहते हैं की ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता हैं। इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता हैं। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी आप मेरा एक काम करना। सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि में आजाद कब होऊंगा।

2016-06-05

स्वामी और माँ

ओशो ने अपने सन्यासियों को "स्वामी" और सन्यासिन को "माँ" शब्द का सम्बोधन दिया ,,,, 

लेकिन ये कोई शाब्दिक सम्बोधन नहीं है ..... लेकिन बहुत से लोग इस सम्बोधन को मात्र सम्बोधन मान कर प्रयोग करते हैं जिसके कारण osho की दी हुई ये अति-गहन करुणा ... आज मज़ाक बन कर रह गयी है ... !
सबसे पहले तो इस सम्बोधन का वास्तविक अर्थ समझ लेते हैं ---

स्वामी -- स्वामी का अर्थ होता है मालिक .... लेकिन किसका ??? किसका मालिक क्या स्वामी होने से आप किसी के मालिक हो जाते हैं ....... नहीं ..... ओशो ने जब अपने सन्यासियों को स्वामी सम्बोधन दिया था तो उसका अर्थ था .... कि हर पुरुष मे परम संभावना है कि वो अपने अंदर बैठे उस तत्व को जगा सके जो सही अर्थो मे मालिक है ... स्वामी है .... स्वामी अपने आनंद का .... स्वामी अपनी इंद्रियो का .... स्वामी अपने कृत्यो का और उससे आने वाले सभी परिणामो का .... जब कोई इंसान/पुरुष अपने को पूर्ण रूप से जाग्रत कर पाता है तो वो हर जगह सम्राट जैसी गरिमा के साथ जीता है ... वो जो भी कर्म करता है उसमे वो मालिक होता है और उस कर्म से जो भी परिणाम आए सुख या दुख वो उसको भी उसी मालकियत के साथ स्वीकार करता है ..... ऐसा होता है स्वामी ...

2016-06-02

पहले शरीर को तैयार करे

योगासन नही आता हें तो केवल सुबह की सैर आपको आरोय्ग दे सकती हें | योग का पहला संबध स्वास्थ हें | शरीर स्वास्थ होगा तभी आप योग साधना के लिय अपने आप को तैयार कर सकते हें | “आप ध्यान करो” वह कैसे करे, उसका मन नही लगेगा | स्थूल शरीर में कही दर्द हें तो साधक का मन दर्द की ओर लगेगा | इसीलिए पहली नर्सरी से शुरुआत करो, तभी आगे बढ़ सकोगे |

           पहले व्यायाम (योग आसन) और प्राणायाम से शुरुआत करना चाहिये | पहले काया को साधो बाद में योग को साधो |       

2016-05-28

नागा साधु, जानें, इनकी यात्रा का रहस्य


कुंभ खत्म होते रातों-रात गायब होते हैं नागा साधु, जानें, इनकी यात्रा का रहस्य        

 सिंहस्थ की पहचान बने नागा साधु आखरी शाही स्नान कर रात में ही उज्जैन से रवाना हो गए। एक महीने तक सिंहस्थ की शान नागा साधुओं के एकाएक गायब होने से लोग हैरान हैं। हैरानी का कारण ये भी है कि किसी भी कुम्भ में नागा साधुओं को आते और जाते कभी कोई नहीं देख पाता। सिंहस्थ में हजारों की संख्या में नागा साधु आए और चले भी गए, लेकिन किसी ने भी ना तो उन्हें आते हुए देखा और ना ही जाते हुए।

- वे कहां से आए, कैसे आए और कहां गायब हो गए, इसकी चर्चा अब शहर में हर कोई कर रहा है।

- *जब नागा साधुओं की इस यात्रा के बारे में जानकारी हासिल की तो कई रहस्य सामने आए।*---

- राष्ट्रीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी जी महाराज के मुताबिक, नागा साधु जंगल के रास्तों से यात्रा करते हैं। आमतौर पर ये लोग देर रात में चलना शुरू करते हैं।

- यात्रा के दौरान ये लोग किसी गांव या शहर में नहीं जाते, बल्कि जंगल और वीरान रास्तों में डेरा डालते हैं।

- रात में यात्रा और दिन में जंगल में विश्राम करने के कारण सिंहस्थ में आते या जाते हुए ये किसी को नजर नहीं आते।

- कुछ नागा साधु झुंड में निकलते है तो कुछ अकेले ही यात्रा करते हैं। ये लोग यात्रा में कंदमूल फल, फूल और पत्तियों का सेवन करते हैं।

- यात्रा के दौरान नागा साधु जमीन पर ही सोते हैं।

*ऐसे मिलती है कुंभ या सिंहस्थ में शामिल होने की सूचना ...*--

- नरेंद्र गिरी महाराज के अनुसार, हर अखाड़े में एक कोतवाल होता है। ये कोतवाल नागा साधुओं और अखाड़ों के बीच की कड़ी का काम करता है।

- दीक्षा पूरी होने के बाद जब साधु अखाड़ा छोड़कर साधना करने जंगल या कंदराओं में चले जाते हैं तो ये कोतवाल उन्हें अखाड़ों की सूचनाएं पहुंचाता है।

2016-04-01

ध्यानविधि: श्रवणध्यान

ध्यानविधि:श्रवणध्यान 

बैठे हैं घर में, सुनना शुरू करें बाहर की आवाजों को सुनना शुरू करें बाहर की आवाजों को। बहुत जागरूक होकर सुनें कि कान क्या-क्या सुन रहा है। सभी चीजों के प्रति जागरूक हो जाएं। रास्ते पर गाड़ियां चल रही हैं, हार्न बज रहे हैं, आकाश से हवाई जहाज गुजरता है, लोग बात कर रहे हैं, बच्चे खेल रहे हैं, सड़क से लोग गुजर रहे हैं, जुलूस निकल रहा है—सारी आवाजें हैं, उसके प्रति पूरी तरह जाग जाएं। और जब सारी आवाजों के प्रति पूरी तरह जागे हों तब एक बार यह भी खयाल करें कि कोई ऐसी भी आवाज है, जो बाहर से न आ रही हो, भीतर पैदा हो रही हो। और तब आप एक अलग ही सन्नाटे को सुनना शुरू कर देंगे। इस बाजार की भीड़ में भी एक आवाज है, जो भीतर भी पूरे समय गूंज रही है।


2016-03-29

जीवन में पर्याप्त हो यह जरूरी नहीं

जीवन में पर्याप्त हो यह जरूरी नहीं पर जीवन में कुछ हो, इतना तो किया ही जा सकता है। जीवन मात्र ‘जीवन को अर्थ’ देने में एवं ‘जीवन के अर्थ’ को समझने में भी गुजार दिया जाए तो कम नहीं। सारा प्रयास मनुष्य बनने में भी लगा मान लिया जाए, तो भी यह कार्य हीरे तराशने से कम नहीं आंका जाना चाहिए। प्रकृति और मानव के पारस्परिक संबंध में केवल एक ही विमुखता है- प्रकृति में पर्याप्त है और मानव उससे असंतुष्ट। यह असंतोष विकराल रूप लेता हुआ कई और नए असंतोषों को कड़ी-दर-कड़ी में बांधता जाता है। जीवन इसी रोचक द्वंद्व पर टिका है- कि मनुष्य इस असंतोष से असमर्थता को समझते हुए विनम्रता ग्रहण करें या खुद में विनम्रता का संचार करते हुए अपना सामर्थ्य पहचानें।


2016-03-21

धर्म के चार सोपान

धर्म के चार सोपान हैं, सत, तप, दया और दान, प्रत्येक मनुष्य को धर्म के इन चारों गुणों को अपने हृदय में धारण करना चाहिए।

राजा भरत ने इन चारों गुणों को न केवल अपने हृदय में धारण किया, बल्कि उसे अपने जीवन में भी अपनाया, इसीलिए उन्हें धर्म की धूरी को धारण करने वाले की संज्ञा दी गई है।

सत्य को अपना कर हम हरिशचंद्र भले ही न बन पाएँ, लेकिन युधीष्ठिर तो बन सकते हैं, मन से किए गए जप या तप से हमारे अंतःकरण के दुख, दोष और द्वेष समाप्त हो जाते हैं।

हमें अपने से छोटों पर दया करनी चाहिए, हमारे अंदर ऐसा गुण होना चाहिए कि हम दूसरों पर दया कर सकें, इसी तरह धर्म का चौथा गुण दान हैं।

2016-03-17

सच्चा सन्यास

(((((((((( सच्चा सन्यास ))))))))))
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एक व्यक्ति प्यास से बेचैन भटक रहा था. उसे गंगाजी दिखाई पड़ी. पानी पीने के लिए नदी की ओर तेजी से भागा लेकिन नदी तट पर पहुंचने से पहले ही बेहोश होकर गिर गया.
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थोड़ी देर बाद वहां एक संन्यासी पहुंचे. उन्होंने उसके मुंह पर पानी का छींटा मारा तो वह होश में आया. व्यक्ति ने उनके चरण छू लिए और अपने प्राण बचाने के लिए धन्यवाद करने लगा.
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संन्यासी ने कहा- बचाने वाला तो भगवान है. मुझमें इतना सामर्थ्य कहां है ? शक्ति होती तो मेरे सामने बहुत से लोग मरे मैं उन्हें बचा न लेता. मैं तो सिर्फ बचाने का माध्यम बन गया.
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इसके बाद संन्यासी चलने को हुए तो व्यक्ति ने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगा. संन्यासी ने पूछा- तुम कहां तक चलोगे. व्यक्ति बोला- जहां तक आप जाएंगे. 
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संन्यासी ने कहा मुझे तो खुद पता ही नहीं कि कहां जा रहा हूं और अगला ठिकाना कहां होगा. संन्यासी ने समझाया कि उसकी कोई मंजिल नहीं है लेकिन वह अड़ा रहा. दोनों चल पड़े. 
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कुछ समय बाद व्यक्ति ने कहा- मन तो कहता है कि आपके साथ ही चलता रहूं लेकिन कुछ टंटा गले में अटका है. वह जान नहीं छोड़ता. आपकी ही तरह भक्तिभाव और तप की इच्छा है पर विवश हूं.
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संन्यासी के पूछने पर उसने अपने गले का टंटा बताना शुरू किया. घर में कोई स्त्री और बच्चा नहीं है. एक पैतृक मकान है उसमें पानी का कूप लगा है. 
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छोटा बागीचा भी है. घर से जाता हूं तो वह सूखने लगता है. पौधों का जीवन कैसे नष्ट करूं. नहीं रहने पर लोग कूप को गंदा करते हैं. नौकर रखवाली नहीं करते, बैल भूखे रहते हैं. बेजुबान जानवर है उसे कष्ट दूं. 
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बहुत से संगी-साथी हैं जो मेरे नहीं होने से उदास होते हैं, उनके चेहरे की उदासी देखकर उनका मोह भी नहीं छोड़ पाता.
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दादा-परदादा ने कुछ लेन-देन कर रखा था. उसकी वसूली भी देखनी है. नहीं तो लोग गबन कर जाएंगे. अपने नगर से भी प्रेम है. 
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2016-03-16

मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है

The human mind is limitless energy fund

मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है।

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी, चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये। सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं। दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा नहीं- नहीं हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे। उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा , “न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।”

2016-02-24

कर्मयोग क्या है ?

कर्मयोग से तात्पर्य -

“अनासक्त भाव से कर्म करना”। कर्म के सही स्वरूप का ज्ञान।
कर्मयोग दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘कर्म’ तथा ‘योग’ ।
कर्मयोग के सन्दर्भ ग्रन्थ – गीता, योगवाशिष्ठ एवं अन्य।

1. कर्मों का मनोदैहिक वर्गीकरण –

कर्म से तात्पर्य है कि वे समस्त मानसिक एवं शारीरिक क्रियाएँ । ये क्रियाएँ दो प्रकार की हो सकती है। ऐच्छिक एवं अनैच्छिक। अनैच्छिक क्रियायें वे क्रियाएं हैं जो कि स्वतः होती हैं जैसे छींकना, श्वास-प्रश्वास का चलना, हृदय का धड़कना आदि। इस प्रकार अनैच्छिक क्रियाओं के अन्तर्गत वे क्रियाएँ भी आती हैं जो कि जबरदस्ती या बलात् करवायी गयी हैं। ऐच्छिक क्रियाओं को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –
वे क्रियाएँ या कर्म जो कि सोच-समझकर ज्ञानसहित अथवा विवेकपूर्वक किये गये हैं,

वे क्रियाएँ या कर्म जो कि भूलवशात् या अज्ञानवशात् अथवा दबाव में किये गये हों।

दोनों ही स्थितियों में किसी न किसी सीमा तक व्यक्ति इन क्रियायों के फल के लिये उत्तरदायी होता है।
कर्मयोग की व्याख्या में उपरोक्त क्रियाओं के विवेचन के अतिरिक्त कर्मों के अन्य वर्गीकरण को देखना भी आवश्यक होगा।

2016-02-22

आत्मचिंतन करें

dog and donkyएक बार एक कुत्ते और गधे के बीच शर्त लगी कि जो जल्दी से जल्दी दौडते हुए दो गाँव आगे रखे एक सिंहासन पर बैठेगा... 
वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जायेगा, और राज करेगा.

जैसा कि निश्चित हुआ था, दौड शुरू हुई.
कुत्ते को पूरा विश्वास था कि मैं ही जीतूंगा.
क्योंकि ज़ाहिर है इस गधे से तो मैं तेज ही दौडूंगा.
पर अागे किस्मत में क्या लिखा है ... ये कुत्ते को मालूम ही नही था.
शर्त शुरू हुई .

2016-02-16

निस्वार्थ रहना या निस्वार्थ कर्म का क्या है?

निस्वार्थ रहना या निस्वार्थ कर्म का क्या है?


ऐसे कर्म का भाव ऐसी चीज है, जिसे धीरे-धीरे प्राप्त किया जा सकता है। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे क्षण भर में समझा या प्राप्त किया जा सके। लंबे समय तक इसके साथ सजगता बनी रहनी चाहिए। यह गीता की अवधारणा है। कार्य कौन संपादित करता है? शरीर, मन या आत्मा? गीता में इसका उत्तर दिया गया है। तदनुसार शरीर के अंदर बैठी आत्मा कार्य संपादित कर रही है। इस संदर्भ में कार और चालक की उपमा प्रासंगिक है। कार को कौन चलाता है? एक कार सिर्फ धातुओं से बनी एक संरचना है, जिसमें गियर और इंजन लगी है। 
 

2016-02-10

क्रोध आए तो किसी पर क्रोधित होने की जरूरत नहीं

क्रोध 

जब भी आपको क्रोध आए तो किसी पर क्रोधित होने की जरूरत नहीं, सिर्फ क्रोधित हो जाएं. इसे एक ध्यान बना लें. 

कमरा बंद कर लें, अकेले बैठ जाएं और जितना क्रोध आए, आने दें. यदि मारने - पीटने क भाव आए तो एक तकिया लें और तकिए को मारे - पीटें. जो करना हो, तकिए के साथ करें, वह कभी मना नहीं करेगा. यदि तकिए को मार डालना चाहें तो एक चाकू लें और तकिए को मार डालें !


2016-01-26

सूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार सबसे जाने-माने योग अभ्यासों में से एक है। इसका प्रभाव पूरे शरीर पर महसूस किया जा सकता है। लेकिन क्या आध्यात्मिक साधना करने वालों के लिए भी ये फायदेमंद है? क्या यह मन और विचारों पर भी प्रभाव डाल सकता है?

आम तौर पर सूर्य नमस्कार को कसरत माना जाता है जो आपकी पीठ, आपकी मांसपेशियों, वगैरह को मजबूत करता है। हां, वह यह सब और इसके अलावा भी बहुत कुछ करता है। यह शारीरिक तंत्र के लिए एक संपूर्ण अभ्यास है – व्यायाम का एक व्यापक रूप जिसके लिए किसी उपकरण की जरूरत नहीं होती। मगर सबसे बढ़कर यह एक महत्वपूर्ण उपकरण है जो इंसान को अपने जीवन के बाध्यकारी चक्रों और स्वरूपों से आजाद होने में समर्थ बनाता है।

सूर्य नमस्कार : शरीर को एक सोपान बनाना

सूर्य नमस्कार का मतलब है, सुबह में सूर्य के आगे झुकना। सूर्य इस धरती के लिए जीवन का स्रोत है। आप जो कुछ खाते हैं, पीते हैं और सांस से अंदर लेते हैं, उसमें सूर्य का एक तत्व होता है। जब आप यह सीख लेते हैं कि सूर्य को बेहतर रूप में आत्मसात कैसे करना है, उसे ग्रहण करना और अपने शरीर का एक हिस्सा बनाना सीखते हैं, तभी आप इस प्रक्रिया से वाकई लाभ उठा सकते हैं।

2016-01-06

त्रियाचरित्र

त्रियाचरित्र

ये वो विषय है जो आज तक कोई जान नहीं पाया है। इस विषय को ले कर मेरी नानी एक कहानी सुनाया करती थीं।

एक बार एक सन्यासी ने सालों हिमालय पर रहकर चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। उनकी प्रतिभा से उनके गुरु बहुत खुश हुए।
उन्होंने अपने शिष्य से कहा, "तुम्हारा ज्ञान अब अपार है और अब तुम्हारा कर्त्तव्य बनता है कि आप गाँव-गाँव जाकर अपने ज्ञान से लोगों को शिक्षा दो और उनका उद्धार करो।"


गुरु के आदेश को अध्यादेश मानकर सन्यासी महाराज ने अपना रुख गाँव की तरफ कर लिया। कई दिन की पदयात्रा के बाद वो एक गाँव पहुँचे और गाँव के बाहर उन्होंने अपनी एक कुटिया बना ली। उसमें ही उन्होंने एक छोटा सा मंदिर भी बना लिया और वे रोज के रोज रामायण का पाठ तो कभी भागवत-गीता का पाठ करने लगे।

2015-12-31

जीवन मूल्यवान है। जी

लाओत्से कहता है, जीवन को मूल्य दो।


अहोभाग्य है कि तुम जीवित हो। और कोई चीज मूल्यवान नहीं है; जीवन मूल्यवान है। जीवन को तुम किसी चीज के लिए भी खोने के लिए तैयार मत होना, क्योंकि कोई भी चीज जीवन से ज्यादा मूल्यवान नहीं है।

लेकिन तुम जीवन को तो किसी भी चीज पर गंवाने को तैयार हो। एक आदमी ने गाली दे दी; तुम तैयार हो कि अब चाहे जान रहे कि जाए! इस आदमी ने किया ही क्या है? एक गाली पर तुम जीवन को गंवाने को तैयार हो? धन कमा कर रहेंगे, चाहे जान रहे कि जाए।