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2016-10-22

भाग्योदय हेतु श्री लक्ष्मी सूक्तम्‌ का पाठ करें

भाग्योदय हेतु श्री लक्ष्मी सूक्तम्‌  का पाठ  करें 

सूक्त या मन्त्र में कुछ गूढ़ युक्तियाँ छिपी होती है जिनसे अथाह  यश  व लक्ष्मी प्राप्ति संभव है  एवं यह मेरा अनुभूत है स्वयं सिद्ध है जरूरत है श्री सूक्त में जो गूढ़ युक्तिया या सीढ़िया है उन पर अपने पावो को साध कर हम चलते रहे तो हर मंजिल को आप आसानी से पार  कर सकते  है  यह निसंदेह है । 

श्री सूक्त में सोलह मंत्र है हर मन्त्र में कोई गूढ़ युक्ति है उसे जीवन में उतारना होगा तभी लक्ष्मी व यश प्राप्ति संभव है । 

।।श्री श्री लक्ष्मी सूक्तम्‌  ।।

ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।

तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।

दीपावली पर मां लक्ष्मी के आठ रूपों की पूजा दिलाएगी धन-सम्पन्नता

दीपावली पर मां लक्ष्मी के आठ रूपों की पूजा दिलाएगी धन-सम्पन्नता

मां लक्ष्मी के आठ अलग-अलग रूप हैं, जिन्हें अष्टलक्ष्मी कहा गया है। अष्टलक्ष्मी की आराधना से मनुष्य की सभी समस्याओं का नाश होता है और वह समृद्धि, धन, यश, ऐश्वर्य व संपन्नता प्राप्त करता है। 



दीपावली का त्यौहार पांच दिनों तक चलने  वाला महापर्व है। कार्तिक कृष्णपक्ष की अमावस्या को लक्ष्मीजी के पूजन का विशेष विधान है। ब्रह्म पुराण के अनुसार इस दिन अर्धरात्रि के समय महालक्ष्मीजी सद्ग्रहस्थों के मकानों में यत्र-तत्र विचरण करती हैं। इसलिए इस दिन घर-बाहर को साफ-सुथरा कर सजाया-सँवारा जाता है। मां लक्ष्मी की कृपा से मनुष्य को धन-वैभव और सुख- संपदा की प्राप्ति होती है।

अष्टविद लक्ष्मी अर्थात - आद्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, ऐश्वर्य लक्ष्मी,  धान्य लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, धन लक्ष्मी आदि । यानी कि आठ स्वरूपों में लक्ष्मी के अलग-अलग स्वरूपों के साथ अलग-अलग गुणों का प्रभाव एवं इनसे जुड़ी साधना-आराधना  है।... जानिए लक्ष्मी जी के इन आठ रूपों अर्थात अष्टलक्ष्मी के रहस्य को – 


2016-10-04

माँ दुर्गा स्तुति

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नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥१॥

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः ।
ज्योत्स्ना यै चेन्दुरुपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥२॥

कल्याण्यै प्रणतां वृध्दै सिध्दयै कुर्मो नमो नमः ।
नैऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥३॥

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।
ख्यातै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥४॥

2016-10-02

श्री दुर्गा सप्तशति बीजमंत्रात्मक साधना


श्री दुर्गा सप्तशति बीजमंत्रात्मक साधना

ओम श्री गणेशाय नमः
ओम ह्रुं जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः
ओम दुर्गे दुर्गे रक्षीणी ठः ठः स्वाहः

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम

ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे | ओम ग्लौं हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल  ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै
ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ||

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दीनि | नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि ||
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि | जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ||
ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका | क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते ||
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी | विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ||
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी | क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू ||
हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी | भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः ||
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं | धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ||
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा | सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ||
ओम नमश्चण्डिकायैः|ओम श्री दुर्गार्पणमस्तु||

2016-09-24

पितृ पक्ष श्राद्ध के बारे में आवश्यक जानकारी

पितृ पक्ष श्राद्ध 2016 के बारे में आवश्यक जानकारी:-

हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है। 


पितृ पक्ष का महत्त्व -


2016-09-18

पावागढ़ महाकाली का मंदिर, जहाँ सब की मुरादे पूरी होती है


पंखिड़ा तू उड़ी ने जजे पावागढ़ रे...।
म्हारी महाकाली ने जई ने किजो गरबो रमे रे...।

गुजरात के पंचमहल जिले में बना पावागढ़ महाकाली  का मंदिर पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से प्रदेश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। यहां की खास बात यह है कि यहां दक्षिणमुखी काली मां की मूर्ति है, जिसका तांत्रिक पूजा में बहुत अधिक महत्व माना जाता है।

महाकाली मंदिर गुजरात के पंचमहल जिले में स्थित पावागढ़ महाकाली का मंदिर पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक तथा पर्यटन की दृष्टि से प्रदेश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है.
कालीमाता का यह मंदिर माता के शक्तिपीठों में में शामिल है. शक्तिपीठ उन पूजा स्थलों को कहा जाता है, जहां सती के अंग गिरे थे.

2016-09-12

डाकोर का रणछोड़ मंदिर

डाकोर का रणछोड़ मंदिर

श्रीकृष्ण की लीला को समझ पाना एक आम इनसान के बस में नहीं। कहीं वे गुरु की भूमिका में नजर आते हैं, कहीं सखा, कहीं भाई और कहीं रणछोड़जी। माना जाता है कि 1722 ई. में यहाँ रणछोड़दासजी मंदिर का निर्माण किया गया था। इस स्थान की गिनती हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थानों में की जाती है।

भक्तों के लिए रणछोड़ मंदिर का महत्व वैसा ही है, जैसा द्वारिका स्थित द्वारिकाधीश मंदिर का। दोनों ही मंदिरों में कृष्ण भगवान की मूर्तियाँ भी श्याम रंग के पत्थर से ही बनाई गई हैं। श्याम रूप में श्यामसुंदर का रूप बेहद मनोहर लगता है। गोमती नदी के किनारे इस मंदिर का निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया है। ऊपरी गुंबद में स्वर्ण का आवरण चढ़ाया गया है। यहाँ पहुँचकर महसूस होता है, जैसे आप कृष्ण की नगरी में आ गए हों। हर तरफ हरे कृष्णा ध्वनि का मधुर नाद होता रहता है। 

2016-09-11

गणेश जी की साधना शीघ्र फलदायी होती है

प्रथम पूजनीय श्री गणेश जी को विनायक, विघ्नेश्वर, गणपति, लंबोदर के नाम से भी जाना जाता हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार किसी भी कार्य से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है।

भगवान गणेशजी की साधना शीघ्र फलदायी होती है। उनको दुर्वा अतिप्रिय है। इसे चढ़ाने से भगवान गणेश तुरंत प्रसन्न होते हैं। मात्र 10 नाम का प्रतिदिन जप ही उनके लिए पर्याप्त होता है। श्रीगणेश की पूजा कैसे की जाती है और कैसे उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है, आइए जानें -


2016-09-05

गंगेश्वर महादेव के दर्शन से सभी तीर्थो की यात्रा का फल प्राप्त होता है

गंगेश्‍वर शब्‍द का अर्थ भगवान शिव होता है जो अपने बालों में गंगा को समेटे हुए है। भगवान शिव को धरती पर प्रवाहित होने वाली गंगा का स्‍वामी माना जाता है। गंगेश्‍वर मंदिर, भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर फादुम नामक गांव में स्थित है जो दीव से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

2016-09-03

निष्कलंक महादेव, शिवजी के पांच स्वयंभू शिवलिंग हैं

गुजरात के भावनगर में कोलियाक तट (Koliyak Beach) से तीन किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्तिथ है निष्कलंक महादेव। यहाँ पर अरब सागर की लहरें रोज़ शिवलिंगों का जलाभिषेक करती हैं। लोग पानी में पैदल चलकर ही इस मंदिर में दर्शन करने जाते है। इसके लिए उन्हें ज्वार (Tide) के उतरने का इंतज़ार करना पड़ता है।  भारी ज्वार (Heavy Tide) के वक़्त केवल मंदिर की पताका और खम्भा ही नजर आता है।  जिसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता की पानी की नीचे समुंद्र मैं महादेव का प्राचिन मंदीर स्तिथ हैं। यहाँ पर शिवजी के पांच स्वयंभू शिवलिंग हैं।



2016-08-13

शिवलिंग

शिवलिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतिमा पृथ्वी पर कभी नहीं खोजी गई। उसमें आपकी आत्मा का पूरा आकार छिपा है। और आपकी आत्मा की ऊर्जा एक वर्तुल में घूम सकती है, यह भी छिपा है। और जिस दिन आपकी ऊर्जा आपके ही भीतर घूमती है और आप में ही लीन हो जाती है, उस दिन शक्ति भी नहीं खोती और आनंद भी उपलब्ध होता है। और फिर जितनी ज्यादा शक्ति संगृहीत होती जाती है, उतना ही आनंद बढ़ता जाता है।

हमने शंकर की प्रतिमा को, शिव की प्रतिमा को अर्धनारीश्वर बनाया है। शंकर की आधी प्रतिमा पुरुष की और आधी स्त्री की- यह अनूठी घटना है। जो लोग भी जीवन के परम रहस्य में जाना चाहते हैं, उन्हें शिव के व्यक्तित्वको ठीक से समझना ही पड़ेगा।और देवताओं को हमने देवता कहा है, शिव को महादेव कहा है। उनसे ऊंचाई पर हमने किसी को रखा नहीं। उसके कुछ कारण हैं।

2016-07-02

शनि स्तोत्

दशरथ कृत शनि स्तोत्र
   
जो भी जातक शनि ग्रह, शनि साढ़ेसात‍ी, शनि ढैया या शनि की महादशा से पीड़ित हैं उन्हें दशरथ कृत शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। 


इस पाठ को नियमित करने से भगवान शनि प्रसन्न होते हैं तथा जीवन की समस्त परेशानियों से मुक्ति दिलाकर जीवन को मंगलमय बनाते हैं...


नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ  वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते।।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

2016-06-16

शस्त्र और शास्त्र के महारथी – परशुरामजी

शस्त्र और शास्त्र के महारथी – परशुराम

★★★★★★★★★★★★★★★

हमहि तुम्हहि सरिबरि कस नाथा, कहहु न कहां चरन कहं माथा।
राम मात्र लघु नाम हमारा, परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।


मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिनका सादर नमन करते हों, उन शस्त्रधारी और शास्त्रज्ञ भगवान परशुराम की महिमा का वर्णन शब्दों की सीमा में संभव नहीं। वे योग, वेद और नीति में निष्णात थे, तंत्रकर्म तथा ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में भी पारंगत थे, यानी जीवन और अध्यात्म की हर विधा के महारथी।

विष्णु के छठे अवतार परशुराम संहार और निर्माण, दोनों में कुशल परशुराम जाति नहीं, अपितु अवगुण विरोधी थे। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में –

2016-06-03

Hanuman Chalisa translated in english


हनुमान चालीसा का अंग्रेजी में अनुवाद

Hanuman Chalisa translated in English....

श्रीगुरु चरन सरोज रज बी
In the Lotus feet of my teacher/Guardian

निज मन मुकुर सुधारि।
I purify the mirror of my heart

बरनउँ रघुबर बिमल जसु
I illustrate the story of immaculate Rama

जो दायकु फल चारि॥
which bestows four fruits (The 4 Purusharth : desire, prosperity, righteousness, liberation)

बुद्धिहीन तनु जानिकै
Considering myself as frail & unwise

सुमिरौं पवनकुमार।
I contemplate Son of Wind (Hanuman)

बल बुद्धिविद्या देहु मोहिं
to impart power, knowledge & civilization

हरहु कलेश विकार ॥
& to eradicate all the miseries of life.

2016-03-29

श्री अक्रूरेश्वर महादेव

श्री अक्रूरेश्वर महादेव

कहाँ स्थित है?

उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री अक्रूरेश्वर महादेव का मंदिर अंकपात क्षेत्र में राम जनार्दन मंदिर के पास स्थित है। अंकपात क्षेत्र के पीछे भी बड़ी रोचक कथा है। उज्जयिनी स्थित संदीपनी आश्रम भगवान कृष्ण की शिक्षास्थली है। आश्रम परिसर में ही एक कुंड है और माना जाता है कि इस कुंड के ज़रिये श्री कृष्ण अपने गुरु के लिए गोमती नदी को यहां तक लेकर आये इसलिए इसे गोमती कुंड कहा जाता है। इसी गोमती कुंड के जल से श्री कृष्ण अपनी पाटी (भोजपत्र) साफ किया करते थे। इस दौरान उनके लिखे अंक कुंड में गिरे थे और फलस्वरूप इस क्षेत्र को विद्वानो का क्षेत्र कहा जाने लगा। इसी कारण इस क्षेत्र को अंकपात कहा जाता है।


अंकपादाग्रतो लिंगम सप्त कल्पानुगं महत।
यस्य दर्शनमात्रेण शुभाम् बुद्धिः प्रजायते। ।


श्री अक्रूरेश्वर महादेव की कहानी शिव पार्वती की एकरूपता को वर्णित करती है। प्रस्तुत कहानी में क्रूर बुद्धि के दोषों को दर्शाया गया है और सौम्य बुद्धि की महत्ता दर्शाई गई है।

पौराणिक आधार एवं महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता पार्वती ने शक्ति रूप धारण किया था और वे अत्याधिक क्रोधित हो गईं थी। उस समय चर, अचर, देवता, किन्नर, समस्त गणों, इत्यादि ने उनकी प्रदक्षिणा एवं स्तुति की थी। केवल एक भृंगिरीट गण ने उन्हें नमस्कार नहीं किया था, ना ही स्तुति की थी। भृंगिरीट का कथन था कि वे शिवजी के पुत्र हैं और उनकी ही शरण में हैं, माँ पार्वती की नहीं। इस पर माता पार्वती ने क्रोधित हो भृंगिरीट को पृथ्वी लोक में दंड भुगतने का शाप दे दिया। माता के शाप से तुरंत ही भृंगिरीट पृथ्वी लोक पर गिर पड़ा। शाप से व्यथित हो भृंगिरीट पुष्कर द्वीप में जा तपस्या करने लगा। उसके कठिन तप से ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, आदि उसके पास गए और उसके शाप के बारे में जानकर भगवान शंकर के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया। तब भगवान शंकर ने भृंगिरीट से कहा कि तुम प्रजा को दुःख देने वाले तप को बंद करो। शापमुक्त होने के लिए तुम पार्वती जी की प्रार्थना करो, उनकी प्रसन्नता से ही तुम शाप मुक्त हो सकते हो।

शिवजी की बात सुन उसने श्रद्धापूर्वक माँ पार्वती की स्तुति की जिसके फलस्वरूप माता ने प्रसन्न हो कहा कि तुम महाकाल वन जाओ। वहाँ अंकपात क्षेत्र के आगे एक दिव्य लिंग है, उसके पूजन अर्चन करो। उस लिंग के दर्शन से तुम्हारी क्रूरता दूर होगी एवं बुद्धि निर्मल होगी। इससे तुम्हें पृथ्वी लोक से मुक्ति मिलेगी और पुनः कैलाश वास प्राप्त होगा। बलराम और कृष्ण ने भी क्रूर होकर कंस और केशी राक्षस का वध किया था। उसके पश्चात वे भी मथुरा से महाकाल वन आये थे और दिव्य लिंग का पूजन कर अक्रूर (सौम्य स्वभाव) हुए। तब माता की बात सुन भृंगिरीट महाकाल वन पहुंचा और बताये हुए दिव्य लिंग की आराधना की। उसके पूजन के फलस्वरूप लिंग में से अर्धनारीश्वर के रूप में शिव पार्वती प्रकट हुए। तब भृंगिरीट को ज्ञात हुआ कि शिव और पार्वती का सनातन देह एक ही है। इस तरह भृंगिरीट की बुद्धि निर्मल हुई और तभी से यह दिव्य लिंग अक्रूरेश्वर (अक्रूरेश्वर यानी बुद्धि को सौम्य करने वाले) कहलाया।

दर्शन लाभ
मान्यतानुसार श्री अक्रूरेश्वर महादेव के दर्शन करने से बुद्धि सौम्य होती है एवं क्रूरता कम होती है।

2016-03-28

श्री महाकालेश्वर मंदिर

भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का स्थान प्रमुख है। तांत्रिक परम्परा में मात्र महाकाल को ही दक्षिण मूर्ति पूजा का महत्व प्राप्त है। इसका वर्णन महाभारत, स्कन्दपुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिवपुराण, भागवत, शिवलीलामृत आदि ग्रंथों में आता है। वर्तमान मंदिर तीन भाग में सबसे नीचे श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग’ उसके ऊपर ’श्री ओकारेश्वर’ एवं सबसे ऊपर श्री नागचंद्रेश्वर है। 

श्री महाकालेश्वर मंदिर के दक्षिण दिशा में श्री वृद्धमहाकालेश्वर एवं श्री सप्तऋषि के मंदिर हैं। इस मंदिर का वर्णन महाभारत, स्कन्द पुराण, वराहपुराण, नृसिंह पुराण, शिव पुराण, भागवत्, शिवलीलामृत आदि ग्रन्थां में तथा कथासरित्सागर, राजतरंगिणी, कादम्बरी, मेघदूत, रघुवंश आदि काव्यां में इस देवालय का अत्यन्त सुन्दर वर्णन दिया गया है। 

2016-02-11

बसन्त पंचमी का महत्व

जानिए क्या है वसंत ऋतु और बसन्त पंचमी का महत्व !!!! 

बसन्त पंचमी पर्व का महत्व:-

The importance of Basant Panchami --

वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

वसंत उत्तर भारत तथा समीपवर्ती देशों की छह ऋतुओं में से एक ऋतु है, जो फरवरी मार्च और अप्रैल के मध्य इस क्षेत्र में अपना सौंदर्य बिखेरती है। ऐसा माना गया है कि माघ महीने की शुक्ल पंचमी से वसंत ऋतु का आरंभ होता है। फाल्गुन और चैत्र मास वसंत ऋतु के माने गए हैं। फाल्गुन वर्ष का अंतिम मास है और चैत्र पहला । इस प्रकार हिंदू पंचांग के वर्ष का अंत और प्रारंभ वसंत में ही होता है। इस ऋतु के आने पर सर्दी कम हो जाती है। मौसम सुहावना हो जाता है। पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। आम बौरों से लद जाते हैं और खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं अतः राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है और इसे ऋतुराज कहा गया है।

2015-12-30

माँ नागणेच्या माता

राठौड वंश की कुल देवी माँ नागणेची जी



मां  नागनेचिया माँ, नाग्नेची माँ , भारत के एक सूर्यवंशी राजपूत कबीले(राठौर) की कुलदेवी है।

माँ नागणेच्या माता के मंदिर तक पहुंचने के लिए जोधपुर से बस, जीप आसानी से मिल जाती हैं। जोधपुर से बालोतरा सड़क मार्ग ( NH 112 )पर स्थित है यह मंदिर। जोधपुर 63 KM. के बाद कल्यानपुर बस स्टॉप से 12 KM. है वर्ष में दो बार नवरात्रों पर चैत्र व आश्विन माह में इस मंदिर पर विशाल मेला भी लगता है। तब भारी संख्या में लोग यहां पहुंचकर मनौतियां मनाते हैं। श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए मंदिर के पास धर्मशालाएं भी हैं।


Nagnechiya Maa  is the kuldevi of Rathore, a Suryavanshi Rajput clan of India. Nagnechiya Maa's history dates back to antiquity. Rao Doohad (grandson of Rao Sheoji) went to Kannauj (where the Rathore originated) and returned with Nagnechiya Maa's auspicious flame, founding her temple in Nagana, Barmer district. She is worshiped not only by Rajputs, but by nearly every Hindu; people of Rathore ancestry visit her temple.

 देवी माँ नागणेची जी का इतिहास


2015-11-30

जानिए तुलसी को

तुलसी जी को तोडने से पहले वंदन करो। 


1. तुलसी जी को नाखूनों से कभी नही तोडना चाहिए,नाखूनों के तोडने से पाप लगता है।

2.सांयकाल के बाद तुलसी जी को स्पर्श भी नही करना चाहिए ।

3. तुलसी जी भगवान् की बहुत प्रिय है इसलिए भगवान् तुलसी के भी भोग ग्रहण नही करते ।

2015-11-25

हाथ में मौली कलावा क्यों बांधा जाता है

क्या आप जानते हैं कि.....

हमारे हिन्दू परम्पराओं के अनुसार ... हाथ में मौली (लच्छा/कलावा) क्यों बांधा जाता है...?????

आपने अक्सर देखा होगा कि..... घरों और मंदिरों में पूजा के बाद पंडित जी हमारी कलाई पर लाल रंग का कलावा या मौली बांधते हैं.... और, हम में से बहुत से लोग बिना इसकी जरुरत को पहचाते हुए इसे हाथों में बंधवा लेते हैं...।

सिर्फ इतना ही नहीं... बल्कि, .... आजकल पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े लोग .... मौली बांधने कोएक ढकोसला मानते हैं .... और, उनका मजाक उड़ाते हैं...!