एक व्यक्ति के पास दो मंजिला मकान है। उसके घर के दायीं ओर एक पांच मंजिला मकान है और बायीं तरफ एक झोपड़ी। जब वह दायीं ओर देखता है तो अपने भाग्य को कोसते हुए दुखी होता है और जब बायीं ओर देखता है तो खुश होता है। देखा जाए तो उस व्यक्ति की खुशी या दुख केवल मस्तिष्क जनित है। हम में से बहुत से लोग मन ही मन हर इंदिय सुख को सुखी जीवन से जोड़ते हैं।
कुछ विचारकों का मानना है कि सुख केवल इंद्रिय विषयक नहीं है यानी उपभोग की वस्तुओं में नहीं है। इसी तरह असुख या दुख भी हमारे मन की कल्पना मात्र है।





