2016-03-08

सूर्य ग्रहण क्या करे क्या ना करे

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर 9 मार्च 2016 दिन बुधवार को 320 वर्ष बाद कुम्भ राशि पर पंचग्रही योग में सूर्य ग्रहण होगा। 


 ग्रहण का सूतक 8 ता. मंगलवार की शाम को 5.24 बजे आरम्भ हो जायेगा। 
ग्रहण स्पर्श - प्रातः 5.24 को (9 ता.)
ग्रहण मध्य - प्रातः 6.4 को 
ग्रहण मोक्ष - प्रातः 6.48 को

ज्योतिष के अनुसार सिंहस्थ से पहले पंचग्रही योग में सूर्य ग्रहण शुभ फलदायी नहीं है। पश्चिमोत्तर भाग को छोड़ कर यह ग्रहण अंचल सहित पूरे देश में खण्डग्रास के रूप में दिखाई देगा।

यह ग्रहण पूर्वा भाद्र पक्ष नक्षत्र में साध्य योग, कुंभ राशि में स्थित चंद्र के साथ घटित होगा। इस समय आकाश में  5 ग्रह केतु, बुध, सूर्य, शुक्र और चंद्र कुम्भ राशि पर साथ रहेंगे। इन ग्रहों पर शनि-युत मंगल की दृष्टि भी है।

आधुनिक विज्ञान अनुसार - 👇

भौतिक विज्ञान की दृष्टि से जब सूर्य व पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा आ जाता है तो चन्द्रमा के पीछे सूर्य का बिम्ब कुछ समय के लिए ढ़क जाता है, उसी घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। पृथ्वी सूरज की परिक्रमा करती है और चाँद पृथ्वी की। कभी-कभी चाँद, सूरज और धरती के बीच आ जाता है। फिर वह सूरज की कुछ या सारी रोशनी रोक लेता है जिससे धरती पर साया फैल जाता है। इस घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। यह घटना सदा सर्वदा अमावस्या को ही होती है।

वैज्ञानिक दृष्टा ऋषि मुनि - 


ग्रह नक्षत्रों की दुनिया की यह घटना भारतीय मनीषियों को अत्यन्त प्राचीन काल से ज्ञात रही है। चिर प्राचीन काल में महर्षियों नें गणना कर दी थी। इस पर धार्मिक, , वैचारिक, वैज्ञानिक विवेचन धार्मिक एवं ज्योतिषीय ग्रन्थों में होता चला आया है। महर्षि अत्रिमुनि ग्रहण के ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे।  प्रकाश  काल से ग्रहण पर अध्ययन, मनन और परीक्षण होते चले आए हैं।

 सूर्य ग्रहण के समय हमारे ऋषि-मुनियों के कथन - 👇

हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन के लिए मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणु बहुलता से फैल जाते हैं। खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिए ऋषियों ने पात्रों में कुश डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जाएं और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है ताकि कीटाणु मर जाएं। ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिए बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़े, भीतर-बाहर के कीटाणु नष्ट हो जाएं और धुल कर बह जाएं।

पुराणों के अनुसार - 👇

 पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है। ये दोनों ही छाया की संतान हैं। चंद्रमा और सूर्य की छाया के साथ-साथ चलते हैं। 


चंद्र ग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमज़ोर पड़ती है।


 गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन या विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है। 


इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में देशी गाय का गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें।

 ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला को कुछ भी कैंची या चाकू से काटने को मना किया जाता है और किसी वस्त्रादि को सिलने से रोका जाता है।

ग्रहण के समय ये करें - 👇

 ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके मंत्रो का जप करना चाहिए। भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें। ग्रहण के दौरान कोई अन्य कार्य न करें। ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है। ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र त्याग करना, केश विन्यास बनाना, रति-क्रीड़ा करना, मंजन करना वर्जित किए गए हैं। ग्रहण समाप्त हो जाने पर पुनः स्नान करके ब्राह्‌मण को दान देने का विधान है। कहीं-कहीं वस्त्र, बर्तन धोने का भी नियम है। पुराना पानी, अन्न नष्ट कर नया भोजन पकाया जाता है और ताजा जल भरकर पिया जाता है। 

ग्रहण के बाद दान देने का अधिक माहात्म्य बताया गया है 

सूतक की स्थिति -👇

 सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण में तीन प्रहर पूर्व सूतक लग जाता है । सूतक की स्थिति में भोजन नहीं करना चाहिये। बालक , वृद्व और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ।

ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। 

'देवी भागवत' में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये।


ग्रहण काल में क्या करें? ग्रहण काल में क्या न करें - 👇👇

ग्रहन काल आरम्भ होने से समाप्ति के मध्य की अवधि में मंत्र ग्रहण, मंत्रदीक्षा, जप, उपासना, पाठ, हवन, मानसिक जाप, चिन्तन करना        मानसिक जाप,
कल्याणकारी होता है.

सूर्य ग्रहण अवधि में देव मूर्तियों को स्पर्श नहीं किया जाता है। ग्रहण मोक्ष के बाद स्वयं भी स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, तथा देवमूर्तियो को स्नान करा कर, गंगाजल छिडक कर, नवीन वस्त्र पहनाकर, देवों का श्रंगार करना चाहिए।
देव प्रतिमाओं के अलावा तुलसी वृक्ष, शमी वृक्ष को स्पर्श नहीं किया जाता है।
ग्रहण के बाद इन सभी पर भी गंगाजल छिडक इन्हें शुद्ध किया जाता है।
ग्रहण काल में अपने इष्ट देव, मंत्र, गुरु मंत्र,  आदि का जाप दीपक जलाकर करना चाहिए।
मंत्रो की सिद्धि के लिये यह सर्वथा शुभ है। । इस अवधि में सूर्य उपासना विशेष रुप से की ही जाती है.

 उपाय - 👇

जिन जातकों की राशि में ग्रहण के कारण कष्ट है, उन्हें तीर्थ जल से स्नान, जप, दान आदि अवश्य करने चाहिए।


राशियों पर पड़ेगा असर -👇

 मेष: लाभ

 वृष: सुख

 मिथुन: भय, अपमान

 कर्क: मृत्यु तुल्य कष्ट

 सिंह: दाम्पत्य जीवन में बाधा

 कन्या: सुख - समृद्धि

 तुला:  चिंता

 वृश्चिक:  शारीरिक कष्ट

 धनु: धन लाभ

 मकर: धन हानि

 कुंभ: दुर्घटना

 मीन: कार्य क्षेत्र में बाधा

💥 विशेष - चतुर्दशी और अमावस्या के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है

🌷 ग्रहण में क्या करें, क्या न करें 🌷
🙏🏻 चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्धि होने पर उस घृत को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाक् सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
🌔 सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक 'अरुन्तुद' नरक में वास करता है।
🌔 सूर्यग्रहण में ग्रहण चार प्रहर (12 घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर (9) घंटे पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं।
🌔 ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए।
🌔 ग्रहण वेध के प्रारम्भ में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही करना चाहिए और ग्रहण शुरू होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिए।
🌔 ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और श्राद्ध तथा अंत में सचैल (वस्त्रसहित) स्नान करना चाहिए। स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं।
🌔 ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो उसका शुद्ध बिम्ब देखकर भोजन करना चाहिए।
🌔 ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए।
🌔 ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए। ग्रहण के स्नान में गरम जल की  अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा जमीन में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, (साधारण) बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का, अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है।
🌔 ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरूरतमंदों को वस्त्रदान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है।
🌔 ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ने चाहिए। बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिए व दंतधावन नहीं करना चाहिए। ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल-मूत्र का त्याग, मैथुन और भोजन – ये सब कार्य वर्जित हैं।
🌔 ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।
🌔 ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए।
🌔 तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किन्तु संतानयुक्त गृहस्थ को ग्रहण और संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिए।
🙏🏻 भगवान वेदव्यासजी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- 'सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया  पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्यग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। यदि गंगाजल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।
🌔 ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम-जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है।
🌔 ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। (स्कन्द पुराण)
🌔 भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिए। (देवी भागवत)
🌔 अस्त के समय सूर्य और चन्द्रमा को रोगभय के कारण नहीं देखना चाहिए।
💥 विशेष ~ कल 9 मार्च 2016 बुधवार को खग्रास सूर्यग्रहण ( भूभाग मे ग्रहण समय : प्रातः 4:49 से सुबह 10:04 ) तक ( भारत का पश्चिम भाग छोड़कर अन्य भागों मे दिखेगा। जहाँ दिखेगा वहाँ नियम पालनीय है। 

🌷 जानिए की यह ग्रहण कहा कहा दिखाई देगा  ????
🌔  यह खग्रास सूर्य ग्रहण मध्यप्रदेश, हरिद्वार, कोलकाता, दिल्ली, पटना, रायपुर, चैन्नई, जगन्नाथ पूरी,  बंगलोर, भरतपुर (राजस्थान)
दिल्ली,उत्तरप्रदेश,आंध्रप्रदेश,कर्णाटक,छत्तीसगढ़, उड़ीसा,बिहार, झारखण्ड,पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा,आसाम, मेघालय,नागालैंड,मध्यपूर्वी महाराष्ट्र और मध्यपूर्वी मध्यप्रदेश में ।।

🌷 ग्रहण के समय निर्देश 🌷
🙏🏻 1. ग्रहण के समय भगवान का चिंतन, जप, ध्यान करने पर उसका लाख गुना फल मिलता है ,सूर्य ग्रहण के समय हज़ार काम छोड़ कर मौन और जप करिए l
🌔 2. सूर्य ग्रहण लगने के पहले खान - पान ऐसा करिए कि आपको बाथरूम में ना जाना पड़े l
🙏🏻 3. भगवान सूर्य का भ्रूमध्य में ध्यान करने से बच्चे बुद्धिमान बनेंगे l
ना करने योग्य :-
🌔 1. ग्रहण के समय सोने से रोग बढ़ते हैं l
🌔 2. ग्रहण के समय संम्भोग करने से सूअर की योनि मिलती है l
🌔 3. ग्रहण के समय मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए, दरिद्रता आती है l
🌔 4. ग्रहण के समय धोखाधड़ी और ठगाई करने से सर्पयोनी मिलती है l
🌔 5. ग्रहण के समय शौच नहीं जाना चाहिए, वर्ना पेट में कृमि होने लगते हैं l
🌔 6. ग्रहण के समय जीव-जंतु या किसी की हत्या हो जाय तो नारकीय योनि में जाना पड़ता है l
🌔 7. ग्रहण के समय भोजन व मालिश करने वाले को कुष्ट रोग हो जाता है l
🌔 8. ग्रहण के समय पत्ते, तिनके, लकड़ी, फूल आदि नहीं तोड़ने चाहिए l
🙏🏻 9. स्कन्द पुराण के अनुसार ग्रहण के समय दूसरे का अन्न खाने से १२ साल का किया हुआ जप, तप, दान स्वाहा हो जाता है l
🌔 10. ग्रहण के समय अपने घर की चीज़ों में कुश, तुलसी के पत्ते अथवा तिल डाल देने चाहिए l
🌔 11. सूर्य ग्रहण के समय रुद्राक्ष की माला धारण करने से पाप नाश हो जाते हैं l
🌔 12. सूर्य ग्रहण के समय दीक्षा अथवा दीक्षा लिए हुए मंत्र का जप करने से सिद्धि हो जाती है l

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